Showing posts with label मधुर यादे ओशो के संग .. Show all posts
Showing posts with label मधुर यादे ओशो के संग .. Show all posts

यारी मेरी यार की (ओशो)--(सुख राज) भाग--3

सुखराज ओशो के बाल सखा

कहानी
     कहानी अब नर्मदा के पात्र की तरह गहरी हो चली थी: इसके बाद फौरन पैंतरा बदलकर ओशो कहते है मैं जाता हूं। तू भी मेरे साथ चल। मैंने कहा, आपकी छोटी गाड़ी है, पहले ही इतने सारे लोग बैठे है, आप निकलो, मैं पीछे-पीछे आ रहा हूं। तो वे बोले, अच्‍छा एक काम कर, तेरे बेटे शेखर को मेरे साथ भेज दे। लेकिन मैं नहीं माना। मेरी यही रट कि मैं आपके पीछे आ रहा हूं।

      ऐसा अक्‍सर होता है। ओशो की त्रिकालदर्शी  आंखे कुछ और ही देखती है और हम आँख के अंधे उस होनी से बेखबर होकर ओशो से बहस करने लगते है। लेकिन वे अपनी अहिंसक पारदर्शिता हम पर थोपते नहीं है। उनका आदेश हमेशा होनी और अनहोनी के बीच एक नाजुक सुझाव की तरह नि:सारित होता है—मानों या न मानों, यह तुम्‍हारी स्‍वतंत्रता है।
      आखिर मैं नहीं माना। ओशो जाते-जाते बार-बार जता गए कि चार बजे से पहले सागर पहुंच जाना। हम एक घंटे के बाद ही निकलने वाले थे। लेकिन मेरे वे राइटर महोदय न जाने कहां गायब हो गये। लिखना-विखना दूर, वे तो हर दम गांजा पीकर धुत पड़े रहते थे। उनको ढूँढ़ते-ढूंढते निकलते हम लोगों को देर हो गई। तीन घंटे बाद हम लोग जैसे-तैसे जीप में बैठे। जीप गेट से निकली, दायी और मुड़कर मेन रोड पर आयी ही थी कि सामने से एक फूल स्‍पीड से आती हुई बस से धड़ाम से टकरा गई। जीप के तो चीथड़े-चीथड़े हो जाने थे लेकिन मैं क्‍या देखता हूं, जीप सही सलामत खड़ी है। सिर्फ उसका एक चक्‍का सूँ करके निकला और पाँच सौ फिट जाकर दूर गिरा, जीप में जितने लोग थे, किसी को खरोंच तक नहीं आई। लेकिन बस ढुलकती हुई पुल के नीचे पंद्रह फीट पर जा गिरी। शुक्र है खुदा का। थोड़ी और नीचे जाती तो पानी में गिर जाती। बस के सब आदमी घायल हो गए। सब जगह चिल्‍लोचोंट मच गई। पूरी सड़क खून से रंग गई।
      और वहां सागर में चार बजने के बाद ओशो मुझे बार-बार याद कर रहे थे। रह-रह कर क्रांति से पूछते, सुखराज नहीं आया। सुखराज नहीं आयाउससे कहा था, चार बजे तक पहुंच जाना। आखिर मैं जब छह बज गये तो ओशो बोले, फंस गया सुखराज।
      उस रात फिर हमारी नींद गायब। वहीं घर, वही जंगल, वैसी ही रात लेकिन कितना फर्क पड़ गया था। रात इतनी तप रही थी जैसे लपटों में बिठा दिया हो। नर्क की कहानी सुनते है न। कि वहां कड़ाहों में तलते है, वैसे तले जा रहे थे हम। सारा वायुमंडल ही उत्‍तप्‍त हो गया था। बार-बार ओशो के शब्‍द याद आने लगे। ‘’It is not a genius Work”

***                             ***                             ***                             ***
      यह अप्रैल-मई की बात है। और उस बरसात में क्‍या तमाशा हुआ वह सुनने जैसी बात है। उस साल नर्मदा में ऐसी बाढ़ आई जैसी कई वर्षों में नहीं आई थी। हमारा मकान तो नर्मदा के तट पर ही बना था। पानी बढ़ता गया, बढ़ता गया....इतना बढ़ गया की पुल और बाँध टूट गये। नर्मदा मैया फुफकारती हुई मेरे आंगन में चली आई। गराज में जितने भी ट्रक, जीपें खड़ी थी, सब एक क्षण में बह गई। उनके अस्थिर पंजर भी देखने को नहीं मिले।
      नर्मदा की बाढ़ की तरह सुखराज जी बहे जा रहे थे, उनको पता नहीं था कि उस धाराप्रवाह में वे कितना बड़ा सत्‍य कह रहे थे, ‘’आपको विश्‍वास हो या न हो, लेकिन पानी बढ़ते-बढ़ते उस बिंदु तक आ गया जहां ओशो जी का पलंग बिछा था। बस उस स्‍थान को छूकर पानी उतरने लगा। मनुष्‍य को समझने में देर लग रही है लेकिन नर्मदा को देर नहीं लगी वह जानने में कि कोई बुद्ध यहां आया था।
      उस साल न जाने कैसी विचित्र बाढ आई कि जहां-जहां भी सुखराज जी ने पूंजी लगाई हुई थी वह सब उस सर्वभक्षी जल में स्‍वाहा हो गई। कोई 10-12लाख रूपये शब्दशः: पानी में डूब गये। उस भयंकर विप्‍लव के बीच खड़े सुखराज जी के भीतर से सवाल उठा, बोल सुखराज, इसे सुख ले लेता है कि दुःख में। और दूसरे ही क्षण जैसे कोई आवाज आई, ‘’सुख में कह दे, सुख में।‘’ उस क्षण पता नहीं कौन घेरे हुये था चारों और से।
      यह उत्‍तर बबूले कि तरह ह्रदय में उठा और सुखराज जी खिलखिलाकर हंस पड़े। उनकी हंसी सुनकर पत्‍नी घबराकर दौड़ी चली आई कि कहीं इनके दिमाग में असर तो नहीं हुआ।  उसे देखते ही सुखराज जी ने वही सवाल दोहराया: बोल इसको सुख में लेती है कि दुःख में।
      आप कैसे लेते है।
      हम तो मौज मनायेंगे।
      तो फिर मैं भी आपके साथ हूं, अर्धांगिनी का समुचित जवाब आया।
      और सुखराज जी ने सचमुच हलवा पूड़ी  बनवाई , पाँच ब्राह्मणों को बुलाया और धूमधाम से त्‍योहार मनाया। ओशो के सतधारा आने का मतलब अब उनको साफ हुआ। इससे कि ओशो अपना विश्‍वरूप धारण करते, उन्‍हें अपने इस नादान दीवाने को अपने पंखों में समेट लेना था। संपूर्ण विनाश के बीच खड़े सुखराज जी की यह उन्‍मुक्‍त खिलखिलाहट वस्‍तुत: उनके अंतर में खिले हुए संन्‍यास का फूल था। इस घटना के ठीक एक साल बाद मा आनंद मधु की कीर्तन मंडली निकली और उनके साथ ओशो ने दो मालाएँ और दो कागजों पर लिखे हुए नाम भेजे: स्‍वामी सुखराज भारती और मा योग भारती।
      यार ने अपनी यारी निभाते हुए दुनिया की सबसे बड़ी सौगात अपने याद की झोली में डाल दी थी।
स्‍वामी सुखराज भारती
         

यारी मेरी यार की (ओशो)--(सुख राज) भाग-- 2

सुखराज भारती की यादें..
       एक बार रजनीश बोले, ‘’यार सुखराज, अपन तो ऊब गये है यहां रहते-रहते। अपन तो चलें कहीं और। ये कहां की झंझट में पड़े है, रोज खाना खाओ, पानी पीओ, यह करो, वह करो।‘’ सुखराज जी की आंखों में एक चित्र उभर आया।
      ‘’मेरी तो कुछ समझ में नहीं आया कि कहां चलने की बात कर रहे है। मैंने पूछा, क्‍या कह रहे हो यार? कहां चले अपन?’’

      रजनीश बोले: अपन तो ऊपर चलते है, वहां बहुत मजा है। बड़े सुंदर महल है और यह है, वह है.....न जाने कितने लालच दिखायें। बोले, ‘’वहां कुछ करना नहीं पड़ता, सब अपने आप हो जाता है। वहां बहुत बढ़िया जगत है।‘’ मेरा मन तो भरमा गया। एक तो हम वैसे ही अक्ल के दुश्‍मन। और फिर यह रजनीश कब कौन सी बात उठा दे, इसका कोई ठीकाना नहीं। लेकिन मेरे ह्रदय में हमेशा एक भाव था कि तुम जो कह रहे हो, हमे सब स्‍वीकार है। उनके कहने भर की देर थी कि हम तैयार।
      ‘’तो इस बात के लिए भी हम तैयार हो गये। लेकिन एक सवाल उठा, ‘’हम दोनों ऊपर चले जायेंगे तो घर वाले क्‍या करेंगे? वो लोग तो ढूंढा-ढाढ़ी मचायेंगे। परेशान होंगे।
      ‘’ उसका भी मैंने इंतजाम कर लिया है। ओशो ने बड़े आत्‍मविश्‍वास के साथ कहां, ‘’हम यहां डूप्लीकेट सुखराज और डूप्लीकेट रजनीश छोड़ कर जायेगे। किसी को पता भी नहीं चलेगा कि हम वो ही है कि दूसरे है।‘’
      ‘’आपके मन में संदेह नहीं उठा कि यह संभव है भी या नहीं? मुझे इन बाल योगियों की योजना में बड़ा रस आ रहा था।
      ‘’कहां का संदेह साब, रजनीश ने कह दिया इत्‍ता काफी है। बस, फिर पूरी योजना तैयार हो गई कि कल रात आठ बजे चलना है। इसी जगह ऊपर से कोई दिव्‍य यान आयेगा। हम दोनों उसमें बैठकर ऊपर चले जायेंगे और पीछे अपने डूप्लीकेट छोड़ जायेंगे।
      ‘’लेकिन एक शर्त है, भगवान ने कहा, ‘’किसी से कहना नहीं। कह देंगे तो सब बात बिगड़ जायेगी। मैंने कहा, ‘’बिलकुल ठीक। नहीं कहेंगे। लेकिन बात मन में समाई नहीं।‘’ सुखराज जी जोर से हंसते हुए बोले। आज 45 वर्षों के बाद भी उस रहस्‍य की स्‍मृति से ही उन्‍हें गुदगुदी हो रही थी। उसकी स्‍मृति ही उनके भीतर नहीं समा रही थी। तो वह बात तो क्‍या समाई होगी। वह उनके भीतर उछलती रही।
      ‘’ओशो ने ऐसा चक्‍कर चला दिया था कि मैं बिलकुल अभिभूत हो गया सारी बात से। इतनी बड़ी बात मन में रखना—मेरा तो पेट फूल गया। जैसे-जैसे सुबह हुई। सूरज निकला बात मेरी बरदाश्त के बहार हो रही थी। मज-दतौन कर रहा था। मां चाय बना रही थी। मैंने कहा मां मैं जा रहा हूं...
      ‘’कहां जा रहे हो? मां चाय में उलझी हुई थी।
      ‘’यह तो पता नहीं लेकिन मैं जा रहा हूं—सदा के लिए।‘’
      ‘’क्‍या ? दिमाग तो खराब नहीं हो गया तेरा?’’
      ‘’अब अगली बात तो इससे भी रोचक थी। उसे पेट में रखना भी मुश्‍किल था। वह मैंने उगल दी। सो तू चिंता मत कर मां, मैं डूप्लीकेट सुखराज छोड़ कर जाऊँगा तेरे पास। तू मेरी कमी महसूस नहीं करेगी। मैंने बड़े विश्‍वास के साथ कहा।‘’
      ‘’अब तो मां को लगा कि सचमुच पगला गया है। यह लड़का। उसने कोई ध्‍यान नहीं दिया। खैर साहब, हम ठीक आठ बजे रात को पहुंचे। तो ओशो ने पूछा किसी से कहा तो नहीं? मैंने कहा, सिर्फ मां से कहा है, तब तो मुश्‍किल हो गई बात, यहीं तो बात खराब कर दी तुने, सब गड बड हो गया। अब जो उपर से जहाज आने वाला था वह नहीं आयेगा। क्‍योंकि तुने बात कह दी....सब खराब कर दिया।
  ***                  ***                  ***
      नौवीं कक्षा से कुछ विषय आवश्‍यक हो गए थे, रामपाल सिंह नाम था उसका। उनको बच्‍चों से बड़ा प्रेम था। वे हमारे खेलकूद के शिक्षक भी थे। अब ड्रॉईंग टीचर को कुछ करना नहीं पड़ता था। आम-इमली बनाना है, और क्‍या। वो तो कक्षा में आते थे और बोलते थे, सब सिखा देंगे तुमको आखिरी महीने में। रजनीश, इधर आओ और कहानी सुनाओ। अब ड्रॉईंग की क्‍लास लगी है और रजनीश की कहानी चल रही है। उस समय की जो किताबें थी चंद्रकांता और संतति, भूतनाथ इनको पढ़-पढ कर सुना रहे थे। और उनका स्टाक खत्‍म हो गया तो अपने ही मन से बना-बना कर सुना रहे थे। क्‍लास में ऐसे मजे हो रहे थे साहब।‘’
      ‘’इक्‍कीस मार्च, 1953 के दिन ओशो के भीतर विस्‍फोट हुआ और वे बुद्धत्‍व को उपलब्‍ध हुए। चूंकि आप उनसे निकटतम थे, उस घटना के बाद आपको उनमें कोर्इ पर्क दिखाई दिया?
      सुखराज जी थोड़ा अंतर्मुखी हुए, ‘’ओशो ने कोई फर्क नहीं मालूम पड़ने दिया। वहीं के वहीं, वैसे के वैसे चल रहा है। इस समय वे खादी की धोती और कुर्ता पहनते थे। ढीली धोती, पीछे से लाँग लगी हुई। और लाँग जमीन पर झूमती हुई जा रही है। अब पीछे मूड कर देखता हुं तो याद आत है, एक अजीबोगरीब रौनक चल रही थी उनके भीतर। उनके भीतर के परिवर्तन का तो कोई पता नहीं, पर अपने एक परिर्वतन के बारे में बतला दूँ। करीब-करीब इसी समय से मैं उनको पैर छूकर प्रणाम करने लगा। हालांकि कह, ‘’भैया’’ ही रहा हूं। दोस्‍त तो जी ही रहा है। पहले पाँव छू रहा हूं, फिर बगल में बैठकर सिगरेट भी पी रहा हूं। शराब भी पी रहा हूं। लेकिन मुझे लगता है पीछे भी बुद्ध पुरूष हुए होंगे, लेकिन पहचानने का कोई उपाय नहीं है कि यह आदमी बुद्ध हो गया।
      अब यहां से ओशो का शिखर ऊपर उठने लगा। उनका भारत भ्रमण शुरू हो गया। जगह-जगह घूमकर प्रवचन करना, लोगों को जगाना, ध्‍यान-शिविर, यह सब खेल शुरू हुआ।
      ‘’तो इस दौर में क्‍या आप दोनों के बीच कुछ दूरी पैदा हो गई?’’
      ‘’बिलकुल नहीं साहब, छूटते ही सुखराज जी बोले, दुनिया का स्‍वागत हो न हो, सुखराज का स्‍वागत तो हो ही रहा था ओशो के पास। अब भैया जबलपुर में प्रोफेसर हो गये थे। मैं जब भी उनसे मिलने जाता—वहीं खनक भरी हंसी, ‘’आओ सुखराज’’ वहीं गले मिलना। हां जब वे यात्रा पर होते तो मिलने-झुलने का सवाल ही नहीं था। लेकिन तब बंबई बहुत आ-जा रहे थे। और मेल गाडरवारा से गुजर ही रही है। जैसे ही पता चला, हम सब काम-काज छोड़कर स्‍टेशन चले आ रहे है। उनके डिब्‍बे में बैठकर सफर भी कर रहे है।
      क्‍या बताऊ.., अपनी नादानी में कभी-कभी ऐसा कष्‍ट दिया है ओशो को। वो गाडरवारा से जाना चाह रहे है। उन्‍हें जबर्दस्‍ती रोक लिया, यार दोस्‍तों की महफिल में बिठा लिया। हम मो दोस्‍त ही मान कर चल रहे थे। यह देख ही नहीं रहे थे कि चह कोई दूसरा आदमी हो गया है। और वो हमारी बात मानते थे इसलिए लोग हमें ही आगे कर देते थे। लेकिन वो ऐसे क्षमावान है कि हमें कभी हमारी नासमझी का अहसास नहीं दिलाया।‘’
      खुदा जब दोस्‍त बन कर आता है तो उस दोस्‍ती की जलवानुमाई का क्‍या कहिए। उस दोस्‍ती के पारस स्‍पर्श से खुदी खुदाई बन जाती है। बचपन का दोस्‍त रजनीश आचार्य बन चुका था और ओशो बनने की देहरी पर खड़ा था। लेकिन यह वैश्‍विक उड़ान भरने से पहले वह अपने शैशव काल के मुँहबोले हमराज़ को इस दौर में भी अपना हमसफर बनाना चाहता था। यह वीं प्रेम सगाई थी जिससे बंध कर कृष्‍ण ने दुर्योधन के राजसी मेवे त्याग कर विदुर की झोपड़ी में साग रोटी खायी थी
क्रमश अगली पोस्‍ट में.

यारी मेरी यार की —ओशो ( सुखराज)

(सुख राज का बाल सखा)
      ओशो कम्‍यून के बुद्ध कक्ष में हजारों लोग बैठे है, उस भरी सभा में ओशो कह रहे है, ‘’मेरा बचपन का दोस्‍त सुख राज यहां बैठा हुआ है। हमारी दोस्‍ती इतनी पुरानी है कि उस समय की स्मृति भी अब धुँधली हो गई है। और वह मेरा एकमात्र दोस्‍त है.....मेरे और भी कई दोस्‍त थे लेकिन वे आये और चले गये। लेकिन वह आज भी मेरे साथ है। अविचल क्‍योंकि यह किसी वैचारिक सहमति का सवाल नहीं था। प्रेम का सवाल था। इससे कोई लेना देना ही नहीं था कि मैं क्‍या कहता हूं, क्‍या करता हूं, वह क्‍या करता है, क्‍या कहता है। यह बात ही असंगत है।...सुख राज बड़ा प्‍यारा आदमी है।

      सुख राज भारती हमेशा गदगद ही रहते है। बड़ी कच्‍ची उम्र में रजनीश चंद्र मोहन नामक प्रेमासिंधु ने उनका पैमाना ऐसा लबालब भर दिया हे कि वह अब सिर्फ छलक़ता ही रहता है। ओशो के वे सबसे पहले और शायद सबसे आखिरी मित्र है। ओशो के सर्वप्रथम दर्शन की छाप आज भी उनकी स्‍मृति पर अंकित है।
      अपनी चित्रमय शैली में वे उन पहली मुलाकात का वर्णन कुछ इस प्रकार करते है। ‘’ओशो सीधे दूसरी कक्षा में भर्ती हुए। वह जब कक्षा में आये तो क्‍लास लग चुकी थी। जूट की पट्टियाँ बीछी थी। लड़के अपनी-अपनी जगह बैठे हुए थे। इतने में एक सांवला सा लड़का अपने चाचा के साथ दरवाजे पर आकर खड़ा हुआ। उसकी उम्र होगी कोई नौ-साढ़े नौ वर्ष की। घने घुंघराले बाल, बड़ी-बड़ी आंखे, निर्भीक मुद्रा। आते ही उसने पूरी कक्षा पर एक नजर घुमाई। उसे देखते ही मेरा मन चाहा कि इस लड़के से मेरी दोस्‍ती होनी चाहिए। और आश्‍चर्य पूरी क्लास का निरीक्षण कर वह लड़का मेरा चुनाव करता है। वह जैसे ही मेरे पास आत है, मैं खिसक कर उसके लिए जगह बनाता हूं।
      वह लड़का मेरे पास आकर बैठ जाता है। मैं नाम पूछता हूं, तुम्‍हारा नाम क्‍या है?
      रजनीश। तुम्‍हारी?
      सुख राज। चलो, आज से हम दोस्‍त हो गये।
      और हम दोनों ने अंगूठे से अंगूठा मिलाया और अपना-अपना अंगूठा चूम लिया। इसका मतलब हुआ अब यह बंधन अटूट हुआ।
      फिर रजनीश ने अपना बस्‍ता खोला, उसमें से स्‍लेट निकाली। क्‍या बढ़िया स्‍लेट थी। मैं तो ईर्ष्‍या से भर गया। मेरी स्‍लेट तो बिलकुल घटिया थी। मास्टर जी थोड़ा इधर-उधर हो गये तो हमारी बात शुरू हुई।
      रजनीश ने पूछा, तुम्‍हें क्‍या आता है?
      हमको तो कुछ भी नहीं आता।
      चित्रकारी आती है?
      हमने कहा: नहीं आती।
      मुझे आती है।
      कुछ बनाकर दिखाओं तो जाने।
      और पलक झपकते ही घोड़ा बन गया। फिर देखते ही देखते गाय बन गई। मैंने सोचा, इसको कोई कठिन विषय देना चाहिए। गाय-घोड़ा तो क्‍या कोई भी बना सकता है। मैंने उससे कहा, एक बैलगाड़ी बनाओ, जिसमें गाड़ीवान बैठा हो और गाड़ी को छत भी हो। और इधर मैंने कहा नहीं और उधर खटाखट-खटाखट बैलगाड़ी बनकर तैयार हो गई। हमने कहा, वाह यार, तुम तो बड़े होशियार हो।
      मैं उसकी बुद्धि से बड़ा प्रभावित हुआ। और इसके साथ-साथ गर्व भी महसूस हुआ की ऐसा लड़का मेरा दोस्‍त है।
      फिर शाम को स्‍कूल खत्‍म होने पर हम दोनों ने एक-दूसरे को अपना-अपना घर दिखाया। और हम दोनों के बीच यह तय हुआ कि दोनों साथ जाएंगे साथ आयेंगे। स्‍कूल के खत्‍म होने पर साथ खेलेंगे।
      अब दोपहर की छुट्टियों में हम घर जाकर, कुछ खा-पीकर फिर स्‍कूल आते थे। आते वक्‍त  ओशो के घर जाकर, उसको साथ लेकर स्‍कूल वापस आते थे। एक दृश्‍य जो मुझे सदा ख्‍याल में रहा है वह यह था कि मैंने ओशो को कभी अपने हाथों से खाना खाते नहीं देखा। 10-12साल की उम्र तक उनकी मां या नानी उन्‍हें खिलाती थी। और दोपहर में वे हमेशा दूध-रोटी खाते थे। मैं उनके घर जाता हूं और देखता हूं, ओशो बैठे है पालथी लगाकर और उनके मुंह में कौर दिये जा रहे है।
      तो तब आपको यह दृश्‍य अजीब नहीं लगता था।
      अब कौन जाने क्‍या लगता था। क्‍योंकि ओशो के साथ ऐसे-ऐसे अजीब दृश्‍य देखने को मिले है कि वह दृश्‍य तो बिलकुल धुल गया उनके सामने। और ओशो की क्‍या कहें। वे जो करें सो थोड़ा है। सुख राज जी ने अपने उसी सहज अंदाज में कहा।
      यादों के भंडार में से किसी चिनगारी को कुरेदते हुए सुख राज जी कहने लगे, ओशो दूसरी हिंदी बहुत अच्‍छी पढ़ते लगे थे। मुझे ठीक से पढ़ना नहीं आता था। मैं अटक-अटक कर पढ़ता था। और वे जाने कहां-कहां से कहानियों की किताबें लाते थे और बोलते, सुख राज यह देख कितनी अच्‍छी कहानी है। हम कहते सुनाओ यार। वे कहते, चलो बग़ीचे में चलें। स्‍कूल के पीछे एक बग़ीचा था। उसमें चले गये। उसमें बिही के पेड़ के नीचे दोनों बैठ गये। सुन रहे है। सुनते-सुनते अपने को थोड़ी अलाली आ गई तो उनकी गोदी में लेट गया और रजनीश पेड़ से पीठ टिकाकर बैठे किताब पढ़े चले जा रहे है।
      कहते-कहते सुख राज जी गाडरवारा की उस नीरव दुपहरी में फिर से लौट गये। तब उन्‍हें क्‍या पता था कि वह साक्षात परब्रह्म की गोदी में विश्राम कर रहे थे। लेकिन उस धन्‍य भागी बिही के पेड़ और निःशब्द आकाश ने इस निर्मल प्रेम की छवि निश्चित ही अपने अंतस में अंकित कर ली होगी।
      उन दिनों सुख राज और रजनीश का यह अटूट नियम था कि सांझ होने से पहले खाना खा लिया और फिर सुख राज के घर अनाज मंडी में 10-15 बच्‍चे खेलने के लिए इकट्ठे हो गये।
      बुद्ध कक्ष की तरफ इशारा करके सुख राज कहने लगे, यह महफिल आज जमी नहीं, यह बड़ी पुरानी है। हम 9-10 साल के थे तब की बात है। हमारा रोज का नियम था। शाम को एक डेढ़ घंटा खूब खेलना। और फिर जैसे ही खेल खत्‍म फारिग हुए, आ गये हमारे गोदाम में, वहां बोरे-मोर लगे थे। सब बच्‍चे अनाज के बोरों पर बैठ गये। एक बोरे पर रजनीश बैठे है। पहले बोलेंगे सुख राज एक गिलास पानी। मैं भाग कर घर से पानी ले आता। न जाने क्‍या, मुझे बड़ी खुशी होती थी पानी लाने में। और बस, फिर रजनीश शुरू। अब शुरू यानी शुरू। एक घंटे तक तो बीच में कोई बोल नहीं सकता।
      बुद्ध सभागार के उस निपट देहाती, अनगढ़ रूप को मनश्चक्षु से देख मुझे बड़ी पुलक महसूस हो रही थी। अनाज मंडी में बोरों पर बैठी हुई वह बाल सभा आज के बुद्ध कक्ष से क्‍या कम शानदार थी?
      लेकिन ये 9 वर्ष के बुजुर्ग प्रवचनकर्ता बात क्‍या करते थे?
      बात चाँद-तारों की हो रही थी साब कि दूर आकाश में ऐसा है, और वैसा है। और अपने पृथ्‍वी के लोग यहां रह रहे है। अब डीटेल तो कोई याद नहीं रह गई। लेकिन इतना याद है कि हम भौंचक्का होकर सुनते थे—जैसे आज यहां पर सुनते है न, ठीक वैसे ही, और एक सिटिंग में एक कहानी तो पूरी नहीं होती थी। जैसे यहां सतत बोलते है। आज जहां खत्‍म किया कल वहीं से चालू हो गये। सुख राज कल हम कहां थे.....ओर यह सिलसिला तब से आज तक चला आ रहा है। र्निबाद्ध बिना रुके। ऐसा कभी नहीं हुआ कि रजनीश गाडरवारा में हों और शाम को उनका भाषण न हुआ हो। विषय बदलते गये। श्रोता बदलते गये। सभी का रूप बदलता गया लेकिन कार्यक्रम वही का वही।
      बचपन की बातें बताते-बताते सुख राज जी का बचपन फिर लौट आया था। अब हम ओशो कम्‍यून में नहीं राम घाट पर बैठे थे। उनके सामने वही दस साल का शरारती रजनीश खड़ा है और वे उससे फिर लड़-झगड़ रहे है। उनका बोलने का खास प्रादेश लहजा उस माहौल को एक जीवंतता प्रदान कर रहा था।
     
क्रमश अगली पोस्‍ट में...

Related Post

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...