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पोनी--एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा—(अध्‍याय—28)

मैंने भी प्रेम किया—
    अचानक एक दिन घर में गहमागहमी शुरू हो गई। मैं बहुत समझने की कोशिश कर रहा था परंतु मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। भैया-दीदी की स्‍कूल की छुटियां थी। दिसम्बर माह था। दिन की घूप बहुत अच्‍छी लगती थी। और रात को कड़ाके की ठंड शरीर की हड्डियों को भी सिहरा देती थी। और इन दिनों एक बात और थी मैं रोज ही पापा जी के साथ जंगल में सुबह -सुबह जाता था। पापा जी शहर कर के आते और में उस धूल भरे रस्‍ते पर बहुत ताकत के साथ दौड़ लगाता। मुझे अपने पूरे जोर से दौड़ने में बहुत मजा आता था। रात का अँधेरा होता था। आस पास कोई नहीं होता था। दूर रह-रह कर कभी-कभार गीदड़ों की हाऊ....हाऊ की पूकार सुनाई देती थी। आज कर जंगल में कुत्‍ते रहते थे उन में से दो कुतियाँ जो जंगल में रहती थी उन्‍होंने बहुत प्‍यारे-प्‍यारे बच्‍चे दे रखे थे। मैं और सब करता था परंतु बच्‍चे मुझे बहुत अच्‍छे लगते थे।
कुछ कुत्‍ते बच्‍चों से बहुत चिड़ते है और मैंने सूना था कुछ तो उनको जान से भी मार देते थे। परंतु मैं ऐसा नहीं करता था। मुझे बच्‍चे बहुत अच्‍छे लगते थे। और इसमें से एक जो काली सफेद कुतियाँ है उस के साथ तो मेरा मिलन भी हुआ था। उस दिन पापा जी मेरा कितना इंतजार करते रहे। पहले तो मैं गायब हो गया। और फिर हम चिपक गये। ये चिपकने वाला मामला पूरी पृथ्‍वी पर हमारा ही होता है। और किसी पशु में ऐसा नहीं होता। फिर चाहे भेड़िया हो या लोमड़ी...या शायद सियार भी। इस के बारे में अधिक नहीं जानता परंतु भेड़िया के बारे में मैं पक्‍का कह सकता हूं। हम जब नर-मादा चिपकते है। वहीं तो सहवास का आनंद है। उत्‍तेजना के बाद विराम का क्षण है। उत्पात के बाद जो शांति आती है वह केवल हम ही महसूस करते है।
      परंतु मनुष्‍य ने तो इसे गलत ही समझा है। क्‍योंकि गली मोहले में हम जहां मरजी चिपक कर खड़े हो जाते है। आती जाती बहुत बेटियाँ देख कर शरमा कर दोहरी हो जाती है। ये सब समाज की परंपरा के लिहाज से अच्‍छा नहीं है। परंतु न जाने प्रकृति ने क्‍या सोच कर बनाया। जगत हंसाई हमारे ही नाम क्‍यों कि। जंगल में तो ठीक था परंतु शहर में मनुष्‍य के बीच एक असभ्‍य सा लगता है। इस के बारे में अनेक-अनेक कथा सुनने में आती है। परंतु एक कथा मैंने सूनी है। एक बार एक कुत्‍ता जंगल में घूमता हुआ। एक ऋषि के आश्रम में आ गया। वहाँ पर एक ऋषि और उनकी पत्‍नी एकांत में एक निर्जन स्‍थान पर प्रेम क्रीड़ा कर रहे थे। न जाने उन के इस प्रेम आलाप को देख कर हमारा एक पूर्वज क्‍यों इतना मंत्र मुग्‍ध हो गया की अपलक उन्‍हें निहारने लगा। जब ऋषि का प्रेम क्रीड़ा खत्‍म हुई और उसने एक कुत्‍ते को अपनी और इस तरह से ताकते हुए देखा तो वह झेप गया। और उसे अपने अंदर एक निर्लजता का एहसास हुआ। कि मैं जो कर रहा था वह किसी प्राणी ने देख लिया। क्‍योंकि प्रेम प्रसंग में कुछ ऐसा किया जा जाता है कि उसके बाद आदमी को सोचने में लज्‍जा महसूस होती है। और ऋषि तो महान होता है। उसकी महानता पर इस तरह से किसी की नजर पड़े तो वह क्रोध में आ जाता है। और भारतीय ऋषि तो दुर्वासा का अवतार है। वह तो जरा सी बात पर आदमी को क्‍या किसी पहाड़ को पेड़ को श्राप दे सकता है। और सच में कहते है ऐसा ही हुआ। उस ऋषि ने क्रोध में आकर हमारी परी जाति को श्राप दे दिया। कि तुमने किसी की प्रेम क्रीड़ा को देखा है। तो आज के बाद जब भी तुम प्रेम क्रीड़ा करोगे तो तुम्‍हें सारा जगत देखेगा। देखेगा ही नहीं वह उसे दुतकार देगा। तुम्‍हें भगाया जायेगा। मारा जायेगा। परंतु ऋषि को ऐसा तो समझना चाहिए था कि हमारा पूर्वज हमारी जाती के पास भाषा नहीं है। फिर हम इस बात का विस्‍तार या विवेचन नहीं कर सकते। एक कुत्ते ने देखा वह शायद दूसरे से संवाद कर कह भी नहीं सकता। और हो सकता है उसे कुछ अचरज लगा हो कि ये दो मनुष्‍य किस मुद्रा में बैठे है या लेटे है। ये क्‍या कर रहे है। कहीं कोई कुछ गलत तो नहीं कर रहा । या मार तो नहीं रहा। अब भला लाखों साल पहले हम इतने बुद्धि मान थोड़े ही होंगे। आज कौन हमारी बुद्धि के चार चाँद लगे है।
      खेर उस ऋषि महाराज ने हमारी जाति को श्राप दे दिया। और हम आज भी उसे गली मोहलो में ढोये और घसीटते चले जा रहे है। कोई हम पर हंसता है कोई लात मारता है। कोई-काई नई नवेली घूँघट की ओट से हंस कर शरमाती जरूर है पर उसे कोई खास देखना नहीं कहां जा सकता। खेर ये हमारी जाती के सब अच्‍छी बात नहीं है। मनुष्‍य ने जितनी भी बुराईयां हमारी जाती में ढूंढनी चाही ढूँढी परंतु हम भी एक ढीठ प्राणी ठहरे जरा भी टस से मस नहीं हुए। लात, दुतकार खाकर भी हमने उसके पैरो को ही सहलाया उन्‍हें चाटा उनके आव भगत में हम पूछ हिला-हिला कर स्‍वागत किये। ये ही मेरी वफादारी है जो कोई भी दुनियां का आदमी देख ले सकता है। और इसी सब के कारण आज हम पशुओं में श्रेष्‍ठ तरह से जी रहे है। कोई भी जाती हमसे महान नहीं है। कभी किसी जमाने में शायद कृष्‍ण भगवान के जमाने तक गाय मनुष्‍य की प्रिय पशु हुआ करती थी। क्‍योंकि वह बहुत उपयोगी थी। उसके बच्‍चे, उसका गोबर....सब काम का था। वैसे हम तीनों प्राणी जो पहले-पहले मनुष्‍य के संग आये उनमें से समय-समय पर अपनी पहचान बनाते रहे। कभी गाय का युग था। जब देश स्‍वर्ण युग था। आश्रम थे, चरागाह थी। और उसके बाद आया घोड़े का समय जब चारों और युद्ध ही युद्ध और मारा मारी होती थी। तब परिवहन का साधन भी घोड़ा ही हुआ करता था जो द्रुत गति से भाग सकता था। खेर अब कलयुग आ गया है। न दूध की जरूरत है, न परिवहन की जरूर है। उनके और विकल्‍प आ गये है। आज के संग साथ की जरूरत है। आज में मनुष्‍य के बहुत करीब आ गया हूं। आगे जाने अब किस का समय आये। संभावना तो और किसी की नहीं है।
       जब भी मैं पापा जी के साथ जंगल में जाता तो वह एकांत में जिन दो कुतियाओं ने बच्‍चे दे रखे थे उनमें से दो-दो बच्‍चे मेरे रंग रूप के थे। और पापा जी उन के खाने के लिए हमेशा कुछ ने कुछ ले ही जाते थे वह तो मोरों और पक्षियों के लिए दाना, जब छुट्टी का दिन होता तो सब बच्चे भी साथ होते। उस दिन बहुत मस्ती होती थी। गीदड़ों के लिए ब्रेड....किसी के रस्‍क, और किसी के बाजरा....आदी। उस चितकबरी कुतियाँ के साथ मुझे पापा जी ने चिपका हुआ देखा भी लिया था। पापा जी उस दिन कितनी ही देर तक मुझे आवाज दे-दे कर ढूंढते रहे। और मैं हूं कि उस कुतियाँ के पीछे लगा था। आखिर कार बाद में जब मिला तो पापा जी कितने परेशान चुके थे। पूरे जंगल के कितने ही चक्‍कर लगा चुके थे। इस तरह से वह मुझे जंगल में छोड़ कर घर जा भी नहीं सकते थे। और आखिर कर उन्‍होने मुझे एक पेड़ के नीचे छाव में उस कुतियाँ के साथ चिपका हुआ देख लिया। तब जाकर उन्‍हें चैन मिला। जैसे ही पापा जी ने मुझे देखा तो मुझे बहुत शरम आई और मैंने कोशिश की उस अलग होने की। कि किसी तरह से अलग हो जाऊं परंतु हो नहीं सका। पापा जी मुझे इस अवस्‍था में देख कर दूर एक पेड़ के नीचे बैठ गये। उन्‍हें शायद कम से कम यह तो तसल्ली हुई होगी की मैं यहां पर सकुशल हूं। और मुझे इस अवस्‍था में देख कर वह अति प्रश्न थे। कितनी ही देर वह मेरा वहां बैठ कर इंतजार करते है। मैं समझता था कि वह गुस्‍सा करेंगे। परंतु ऐसा नहीं हुआ। जब काफी देर बाद मे चिपक से छूटा तो पहले तो अपने अंग को चाटता रहा उस समय मेरे उस अंग में  काफी जलन हो रही था। वह निचोड़ कर एक दम से लाल हो गया था। थोड़ी सूजन भी आ गई थी। जब वहां चाटनें से कुछ राहत महसूस की तो मैं उसके बाद में पूंछ हिलाता हुआ। पापा जी के पास गया और उनके हाथ को चाटनें लगा। उनके हाथ में मेरी चेन और डंडा था। अब में समझने की कोशिश कर रहा था की कोन मेरे गले का हार बनेगा। परंतु पापा जी ने मरे शरीर को प्‍यार से सहलाया और मेरे कान के पास आकर कहने लगे की खुब जालिम, धोखा दिया और फिर चुप से कहां कि  ये सब क्‍या हो रहा था..... उस समय शर्म के मारे मेरा चेहरा लाल हो गया। कि जेसे मेरे चौरी पकड़ी गई हो। और मैंने अपनी पूछ को खुब जोर से हिलाया और शर्म के मारे सर झुका लिया। परंतु पापा जी खुश थे। एक प्रकृति का मिलन देख कर। उनके मन में इस को लेकर कुछ भी विरोध नहीं था। उसके बाद पापा जी ने मेरे गले में पट्टा बाँध दिया। मेरा मन भी घर जाने को उतावला था। एक मन तो चाहता था कि यही रह जाऊं, उस के संग साथ कुछ और समय बिताने को कर रहा था। शायद यह प्रकृति का रासायन था जो मुझे सम्‍मोहित कर रहा था। परंतु मनुष्‍य के संग साथ और उसका प्रेम इस के सामने बड़ा हो गया और यह फिका पड़ गया। ये तो प्रकृति का एक खेल था। शायद मन कुछ विकसित हो गया था। प्रकृति के सम्मोहन को तोड़ रहा था। ऐसा केवल मनुष्‍य कर सकता है। और मैं शायद पापा जी के संग साथ रह कर ऐसा कर सका नहीं तो हम पशु कहां प्रकृति के पाश को तोड़ सकते है। इसी लिए तो हमारा नाम पशु है। फिर मेरे ख्‍याल में जो मनुष्‍य भी इस में प्रकृति के सम्मोहन में हमारी तरह ही बंधा हो तो उसे पशु ही कहना चाहिए। उस का शरीर चाहे मनुष्य का हो। खेर ये बात तो बहुत उँची है......ओर मैं ज्ञानी बनना नहीं चाहता परंतु में बस एक अनुभव आपको कह रहा हूं जो मुझे हुआ फिर आप चाहे मुझे अहंकारी ही क्‍यों न कहो। बस मैं जल्‍दी से जल्‍दी घर जाकर आराम से सो जाना चाहता था। मुझे न जाने क्‍यों नींद सी आ रही थी। दूसरी और शरीर तोर पर भी मुझे बहुत थकावट महसूस हो रही थी। किसी तरह से अपने शरीर को मैं खुद ही घिसटता हुआ घर पहुंचा। पेर और शरीर इतना भारी हो गया था की उसे उठाने को मन नहीं कर रहा था। किसी तरह से घर पर पहूंच ही गयाद्यजाकर पापा जी ने मम्‍मी के कान में कुछ कहां, मम्‍मी जी ने मुझे खाने के लिए पेडी गिरी दी और दूध भी दिया। मैं तिरछी नजरों से देख रहा था कि मम्‍मी जी के चेहरे पर शरारती हंसी थी। किसी तरह से पेडी गिरी और दूध मैं खत्‍म किया ओर उस के बाद मैं घोड़े बेच कर सो गया। कितनी ही देर सोता रहा मुझे पता नहीं चला।
      सपने में भी वही सब में देखता है। दौड़ता रहा। और न जाने क्‍या–क्‍या सब मैंने देखा। दूर कहीं पर अपना घर दिखाई दे रहा था। और में घर की और भाग रहा था और धीरे-धीरे घर बहुत दूर जा रहा है। और उसी सब के बीच में मुझे लगा मैं अपनी मां का दूध पी रहा हूं। कभी मुझे अपनी मां का चेहरा नजर आता और कभी उस चितकबरी कुतियाँ का.....मैं समझ नहीं पार रहा था ये क्‍या हो रहा था। परंतु इस सब के बीच भी मुझे कोई अचरज नहीं हो रहा था। शायद स्‍वप्‍न बहुत लम्‍बा चला जो पूरा याद नहीं रख सका। कहीं मुझे अपना परिवार नजर आता है। कहीं अपने बच्‍चे। और मैं उनके साथ खेल रहा हूं, वह मुझ पर चढ़ कर खेल रहे है। कोई मेरी पूंछ पकड़ रहे है। कोई मेरा कान पकड़ कर ही खेल रहा। और मुझे इस सब में बहुत आनंद आ रहा था। लग रहा था पूरा संसार झूम रहा है। अपने पन का ऐसा आनंद मैंने कभी जीवन में महसूस नहीं किया। हालाकि बाद मे सचमुच ही वे बच्‍चे मेरे साथ खेले। परंतु स्‍वप्‍न तो बहुत कुछ ऐसा दे जाता है जो हकीकत में संभवन हीं हो सकता।
      कुछ ही पशु पक्षियों में परिवार बना कर या झुंड बना कर रहने की प्रवृति होती है। उनमें हमारी जाती भी आगे है। हाथी, शेर, खरगोश...आदि परिवार की देख भाल दोनों ही करते है। परंतु अब यहां तो हमारी कोई जिम्‍मेदारी नही है। वह खुद बेचारी बच्‍चो  को पैदा करेगी। और फिर उनका भरन पोषण करेगी। अपना पेट और साथ में इतने बच्‍चों को....खेर पापा जी इतना जरूर करते थे की जब तब उन बच्‍चों की मम्‍मी को कितनी ही बाद दूध पिलाने के लिए आते थे। और उन सब के लिए एक रस्‍क का पैकिट लेकिर आते थे। मुझे ये देख कर अच्‍छा लगता परंतु मैं तो कुछ कर नहीं सकता था। परंतु मन में एक गुमान होता है कि मेरा मालिक जो कुछ कर रहा है वह मैं ही कर रहा हूं।  बच्‍चे मेरे पास आकर मेरे दूध पीने की कोशिश करते। और सच में उस समय मुझे अच्‍छा भी लगता और गुदगुदी भी होती । जंगल में पापा जी काफी पीछे छोड़ कर उन बच्‍चों के पास पहूंच जाता था। और मेरे आने की उपस्थिति को वह बहुत पहले जान जाते थे और मेरे साथ निकल कर रास्‍ते पर आ जाते थे। पापा जी समझ जाते थे कि मैं ही उन्‍हें बुला कर लाया हूं। तब वह रस नहीं खा सकते थे। केवल उनकी मम्‍मी ही खाती थी। उनके लिए तो बाद में जब वह दो महीने के हो गये थे। दूध आने लगा। लेकिन एक बात मैंने देखी उनकी मम्मी भी काफी प्रेम पूर्ण थी। जब दूध एक वर्तन में डला जाता। तो वह दूर खड़ी हो जाती। बच्‍चों को पीने देती थे। खूद नहीं पीती थी। खेर मेरा तो सवाल ही नहीं उठता। मेरे लिए तो घर पर इतना दूध होता था कि में तो उसे देखता भी नहीं था। खेर इन के लिए तो दूध एक इनायत है। और सच मैने देखा वो जो पापा जी ने उन बच्‍चों को 10-20 बार जाकर दूध पिलाया वह उनके जीवन के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ। उनके शरीर हृष्ट-पुष्ट हो गये। और वह प्रकृति के कुरूर हाथों से बचने में सामर्थ्य हो गये। और देखा की वह चारों ही बच्‍चे जीवत बच गये। किसी तरह से वह आनंद उत्‍सव से जंगल में रहते थे। जब मैं जाता तो वह मेरे साथ भागते खेलते। और दूर तक मेरे ही साथ रहते। लेकिन उनकी मम्‍मी मेरे साथ नहीं आती थे। वह तो अपना पेड़ भरने के बाद दूर खड़ी रह जाती थी।
क्रमश: अगले अंक में.......
स्‍वामी आनंद प्रसाद

पोनी--एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा—(अध्‍याय—27)

ध्‍यान और पागलपन

पिरामिड के बनने का काम चलता रहा। पिछले दिनों जैसे ही ध्‍यान का कमरा टूटा था और जो लोग ध्‍यान करने के लिए आना बंद हो गये थे। इन कुछ ही महीनों के इंतजार के बाद उन की तादाद बढ़ गई थी। पिरामिड बन तो गया था परंतु अभी उस के अंदर पलास्टर नहीं हुआ था। लेकिन लोगों को कहां सब्र था। वह तो मौके की तलाश में ही थे। कि जैसे ही ध्‍यान का मौका मिले और वो आये। क्‍योंकि पापा जी ने ध्‍यान का समय ऐसा र्निधारित कर रखा था जो उन्‍हें सुविधा जनक हो। जैसे दिन के 10 बजे दूकान बंद कर के आते थे और 11 बजे ध्‍यान शुरू हो जाता था। ध्‍यान के बाद भी पापा जी को बहुत काम होता था। वरूण भैया को स्‍कूल से लेकर आते थे। हिमांशु भैया के स्‍कूल की बस आती थी। और दीदी तो बड़ी हो गई थी वह तो खूद स्‍कूल चली जाती थी और आ भी जाती थी।

      छूटी जिस दिन होती तो उस दिन तो बहुत से लोग ध्‍यान करने के लिए आ जाते थे। इसमें एक परिवार तो मेरे को फूटी आंखों नहीं सुहाता था। वह हर रविवार के दिन नियम से आते। ध्‍यान करते और खाना भी खाते। मेरी समझ में नहीं आता की लोगों के मन में जरा शर्म है या नहीं। इसी तरह से एक और स्‍वामी जी। जो शायद राजस्थान के थे। वह भी शनिवार की श्‍याम को आ जाते और इतवार को रहते और सोमवार के दिन सुबह यही से काम पर चले जाते। हो न हो इन लोगों ने तो इसे सांड आश्रम बना लिया था। एक ही दूकान से पिरामिड के बनने का काम। और घर का खर्च। बच्‍चों के स्‍कूल की फीस और उपर ये लोग। वो लोग आकर खाना खाते परंतु इतने दिन से देखता हूं नित नियम से कभी लाते कुछ नहीं थे। भले आदमी तुम आश्रम में जा रहे हो किसी होटल में तो नहीं जा रहे कि वह पिकनिक मना रहे हो। और आध्‍यात्‍मिक में कंजुसियत एक महारोग है। वह लोग जब आते तो मुझे बड़ा गुस्‍सा आता। कम से कम यहां आस पास से जो लोग यहां से ध्‍यान करने के लिए आते थे वह ध्‍यान कर के या चाय पी कर तो चले जाते थे परंतु यह तो 5-6 घंटे की फांसी हो गई। और वह सहज स्‍वामी जी जब आते थे तो मुझे उन्‍हें डराने का बड़ा मजा आता था। और उनकी एक और मजे दार बात वह खाना खाने के लिए भी ठीक बीच में बैठते थे। परंतु मैं भी अपने आप में एक ही था। मैं चुप से उसके पीछे जाकर उसके कान के पास बार-बार अपना मुंह कर के ग़ुर्राता कि चुप से मुझे अपने खाने में से खाना दे दो वरना तुम्‍हें बाद में देख लूंगा। और सच में वह मेरे गुर्राने से डर जाता था और चुप से अपनी थाली में से कुछ मेरे सामने रख देता था। लेकिन मैं भी कहां चेन लेने वाला था। खाना खाने के बाद वह कुछ भी काम नहीं करते थे। बस चींटी की तरह इधर से उधर घूमते थे।
      मुझे उसके अंदर से ही पागलपन की दुर्गंध आने लगी थी। और उसकी आंखों में भी पागल पन का जाला से बनना शुरू हो गया था। शायद ये बात पापा जी ने भी देख ली और उसे समझाया। की तुम अब नौकरी करते हो अच्‍छा पैसा कमाते हो। अपने इस सब कामों को छोड़ कुछ दिन के एकांत और ध्‍यान के लिए पूना चले जाओ। वह मनुष्‍य सुनता सबकी है और करता अपने मन की है। वह हां हूं करता रहा। और धीरे-धीरे ऐसा समय आ गया की आप अपनी मदद खुद भी नहीं कर सकते। तब बहुत लाचारी है। पहले जब आप किसी की सहायता से मदद पाकर अपना उद्घार कर सकते थे। और अब तो कुछ नहीं किया जा सकता। और सच में मेरी देखे ध्‍यान इतना सरल जरूर है। परंतु अगर आप अंदर से दो हिस्‍सों में बंटे हो तो वह आपके लिए नहीं है। इस लिए प्रत्‍येक गुरु ध्‍यान के लिए समरपर्ण मांगता है। दो हिस्‍से जीवन को सरल नहीं बना सकते वह और जटिल बना देंगे। आप के अंदर कुछ है और बहार दिखावा करना पड़ रहा है। समाज में तो चल जाता है क्‍योंकि उसकी दूरी कम है। आप दस कदम ये चहरा बना सकते है और वापस आकर फिर दूसरा चेहरा पहन सकते है। लेकिन ध्‍यान करने से दूरी और अधिक से अधिक बढ़ती जाती है इस लिए ऐक्टिंग करना कठिन से कठिनतम होता चला जाता है। वहां तो जो आपके अंदर है वहीं चेहरे पर रहने दिया जाये। इसी में आपकी भलाई है। वारना तो बज गया आपका डंबरू।
      कितने लोग मैने अपने यहां आने के बाद पागल पन की और जाते दिखाई दिये। मेरी समझ में एक बात नहीं आ रही थी की जब ध्‍यान पागल पन की और ले जाता है ये लोग करते क्‍यों है। या यहां पर ही कुछ खास बात है। असल में जहां आपको गहराई अधिक मिलेगी वहीं दूरी अधिक बढ़ती जायेगी। एक औरत और इसी तरह से अपने अंदर डूबती चली गई। और जब वह यहां पर आई अपने पति के साथ तो उसकी हालत अधिक खराब थी। पापा जी ने उसके पति को कहां की आप चाहे तो इसे बचा सकते है। तब उसके पति ने पापा जी बात मान ली क्‍योंकि शायद वह पापा जी पर अधिक विश्‍वास करता था। पापा जी ने कहां की मैंने इसे पहले भी कहा था तुम कुछ क्रियाशील के साथ कार्य करो। ये बैठ कर ध्‍यान ठीक नहीं है। परंतु यह मानी ही नहीं। इस लिए आप इन्‍हें इक्‍कीस दिन के लिये रोज यहां पर लाना। और यहां पर सक्रिय ध्‍यान करने देने। और देखना ये ठीक हो जायेगी। और सच में ऐसा ही हुआ। वह बिन नाग के इक्‍कीस दिन ध्‍यान करने आई। कभी अपने लड़के के साथ कभी पति के साथ। और उन दिनों भी खुब रौनक मेला होता था।
      और सच में वह 21 दिन के ध्‍यान के बाद ठीक हो गई। और पापा जी ने कहां की अभी घर पर भी यह सक्रिय ध्‍यान जरूर करे। और सच पापा ने के सीने से लग कर वह महिला कितना राई। उसके अंदर जमी सभी धूल बह गई। और पापा जी कहते थे कि वह एक मात्र साधक है जो पागल पन के इतने पास जाकर वास संसार में लोट आई। क्‍योंकि उसने अपने को छोड़ा किसी के हाथ में और यही तो सन्‍यास है। हम जो भी करते है करते है अपने मन की ही बात।
      इसी बीच जब रोज ध्‍यान होता तो खाना खाने के बाद सब को मिठाई मिलती। मेरा भी बहुत मन करता। परंतु मुझे मिठाई नहीं दी जाती। तब उस महिला के पति ने एक चमत्‍कारी काम किया। और वह मेरे लिए एक किलो का पेटी गिर ले आय। और सच मैंने उसे पहली बार जब खाया तो मेरे मन बल्लीयों उछलने लगा। और मैंने भी मन से उस महिला के ठीक होने की दुआ मांगी। कितनी अद्भुत चीज थी वह कितना सुस्‍वाद थी। और फिर जाने के एक दिन पहले वह मेरे लिए एक मीठी और टाइट सी कुछ हड्डी की तरह लेकर के आई थी। मैंने उसे छोटी ची परंतु मीठी से वस्‍तु को कितनी मुश्‍किल से खाया। मेरा पूरा मुंह चिकना हो गया था। एक प्रकार के झाग से मेरे मुख में आ रहे थे। असल में वह पति पत्नी कुत्तों को बहुत प्रेम करते थे। उन्‍होंने अपने घर में भी कुत्‍ते पाल रखे थे। जिन्‍हें वह ये सब खाने के लिए देती थी। और यह दूसरी चीज दाँत साफ करने की हमारी पेस्‍ट थी। और सच ही मेरे दाँत पहले से अधिक साफ हो गये थे। बस फिर तो क्‍या ता भला हो उन पति पत्‍नी का जो उन्‍होंने यह पहली बार मुझे खाने के लिए दिल वाई। अब तो हमारे घर में भी वहीं सब बिना नागा के आने लगा। परंतु पहल का अधिक महत्‍व होता है। और उन लोगों ने की थी। और सच उनके साथ हुआ भी अच्‍छा जैसा तुम बोओगे वैसा ही काटोगे।
      वह महिला ठीक हो गई। और वह स्‍वामी जी आज भी पागल है शायद जीवित भी है या नहीं। क्‍योंकि बाद में पता चला कि उसकी नौकरी छूट गई। पहले जो भाई मान सम्‍मान देते थे। अब उन्‍होंने उसे घर से निकाल दिया। अब उन्‍हें कोन सम्‍हाले। इस लिए जब भी छोड़ना है पूरा का पूरा छोड़ना। और वह परिवार भी अब कभी नहीं आता। पता नहीं उन का क्‍या हाल होगा। परंतु वह थे बड़े कंजूस कभी मेरे लिए एक टॉफी भी नहीं लाये.........परंतु में इतना जरूर जानता हूं वे कभी ध्‍यान के मार्ग पर नहीं चल सकते। समाज में चल रहे हो तो कह नहीं सकता। परंतु पहाड़ी पर चढ़ना या तलवार की धार पर चलना ध्‍यान है। असल में हम किसी को छलते तो दिखते है, और अंदर ही अंदर खुश भी बहुत होते है कि देखो हम किसी को बेवकूफ बना सकते है। परंतु छलते हम अपने आप को ही है। दूसरे का छलना अपना ही छलना है। एक आईना है, एक परछाई है......मैं तो केवल एक दर्शक की भांति देखता भर था। मैं मूक रहना चाहता तो रह नहीं सकता था। क्‍योंकि मुझे भौंकने से कोई रोक नहीं सकता था। सत्‍य वचन कहना मेरी मजबूरी हो जाती है।
      अगर ऐसा न हो तो आप गली में झांक कर देख सकते हो मेरी ही जाति के अनेक भाई बहनों को अपने रहने के लिए ठीकाना नहीं है। और पूरे मोहल्ले कि रक्षा की जिम्‍मेदारी उन की है। जरा सा भी मोहल्‍ले में कुछ गलत हो जाये तो भौंक-भौंक गली सर पर उठा लेते है। इस को कहते है वफादारी। वह अंदर और बहार से एक होते है। उन्‍हें इस बात से कोई सरोकार नहीं है की कल रस्‍ते पर चलते हुए आपने उसे लात मारी थी, और आज आपकी गली में कुछ चौर आ जोते है तो हम क्‍यों भौंके यह तो खराब आदमी है। इसने तो मुझे खाने को भी नहीं दिया था और उपर से लात भी मारी थी। ये भेद भाव उनके मन में नहीं है। और इस सब के बाद भी बेचारे की मोत भी कितनी बुरी होती है। कुत्ते की मोत चलो जो भी हो हम किसी का बुरा नहीं चाहते। अगर कुछ कभी गलती से हो जाये तो हम कह नहीं सकते।
      आज तो केवल मैने भी ज्ञान का पूरा पिटारा ही खोल दिया.....चलो जो भी हो मन का उदगार तो आपको कह गया....दिल पर एक बोझ बना रहता तो कितना कठिन था।
क्रमश: अगले अंक में...........
स्‍वामी आनंद प्रसाद  मनसा

पोनी--एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा—(अध्‍याय—26)

प्‍यार और  दुलार   
    पिरामिड ऊपर और ऊपर उठता चला जा रहा था। इतना ऊपर की मैं उसे देख भी नहीं सकता था। उपर सर करने से मुझे चक्‍कर आते थे और वह असमान के उस कोने का छूता सा प्रतीत होता था। जैसे-जैसे वह ऊपर जा रहा था चारों और से पतला होता जा रहा था। अंदर से खड़े होकर देखने पर तो और भी अधिक भय लगता था। क्‍योंकि बीच में चारों और से खाली होने के कारण चारों और की दीवारे ऐसे लग रही थी जैसे अभी अंदर गिर जायेगी। काम अंदर से ही हो रहा था। इस लिए पेड़ अंदर से ही बांधी गई थी। अंदर से चढ़ने के लिए जो पेड़ बंधी हुई थी,अब भी मैं मोका देख कर चढ़ जाता था। वह गिरने वाली बात तो न जाने में कब का भूल गया था। हमारे शरीर में कोई भय या सोच विचार इतनी देर तक थिर नहीं रह सकती। कोई पीड़ा या दुख हमारा पीछा मनुष्य की तरह नहीं करता जन्‍म-जन्‍म तक।

      परंतु फिर भी उस के उपर और उपर चढ़ना मेरे बूते के बहार की बात थी। जब एक बार मैने दूसरी और झांक कर देखा तो मेरे प्राण ही निकल गये थे। बाप रे बाप कितना नीचा है। पहले में जहां से कूद कर भाग जाता था। वह तो नीचे धरातल पर ही रह गया। अब तो हम बादलों के पास आ गये है। एक मजेदार डर और लगता है। जब हम उचे पैड पर चढ़े होते और आसमान में बादल चल रहे होते तो ऐसा उड़ने का एहसास होता की बादल तो खड़े है और ये पिरामिड चल रहा है। कितना डर लगता होगा। कि पिरामिड न जाने कहा चला जाये और हम कभी अपने घर ही न पहूंच पाये। हर पेड़ के आखिर के रद्दे पर लोहे की पतली तारों का एक जाली बिछाया जाता और उस में रोड़ियां सीमेंट और डस्‍ट में मिला कर भर दी जाती। तब मैं समझ जाता की आज का काम इतना ही है। और कल यह पेड़ और उपर जाने वाली है। ऐसा अनेक बार हुआ था, इस लिए यह फार्मूला मेरी समझ में आ गया था।
      आँगन में जो अमरूद और बेलपत्र के वृक्ष थे उन के लिए पापा जी ने पूरा आंगन खाली छोड़ दिया। उन भेल पत्र और अमरूद के पेड़ को जरा
भी काटा नहीं  गया। पापा जी को पेड़ पौधों से बहुत प्रेम है। पास ही आडू का पेड़ है वह अब बूढ़ा हो गया था। जिस के जीने की उम्‍मीद न के बराबर है। परंतु उस पर भी न जाने कितनी चिड़ियाँ श्‍याम को आकर बैठती थी। पूरा अंगन उनकी मधुर नाद से गूंज उठता था। कितना लयवदिता से एक साथ मिल कर गाती थी वह चिड़ियों का झुंड। मानों हजारों-हजार महीन घंटिया कोई बजा रहा हो। फल लगने के समय तो न जाने कितने ही तोते आकर फलों को स्‍वाद लेते थे। और सामने पड़ोसी के घर जो जामुन का वृक्ष था उस पर एक कौवे का जोड़ा रहता था। वह इतना पाजी था कि जब वह अंडे देता तो हमारा जीना दूसवार कर देता। हम अपने घर में काम कर रहे होते परंतु उसे लगता की हम यहां क्‍यों है। और आकर वह चोंच से मुझे राम रतन को और पांचु को मारता परंतु पापा जी को कभी नहीं मारता था। मुझे यह देख कर बड़ा अचरज होता और खुशी भी होती की पापा जी से न जाने क्‍या दोस्‍ती हो गई है। इन पाजी कोवो की।
      उन दिनों पिरामिड के बनाने का काम नहीं चल रहा था। शायद राम रत्‍न मिश्री और पांचु अपने गांव चले गये थे। पिरामिड की अंदर से सफाई कर के उसे ध्‍यान करने के लिए तैयार कर लिया गया। अभी उस में कोई दरवाजा भी नहीं लगा था। और न ही प्लास्तर आदी ही हुआ था। बस किसी तरह से कम चलाऊ बिजली का ही प्रबन्‍ध किया गया। फिर भी एक बात तो है जिसे जिस चीज की चाह होती है वह उसके लिए राह निकाल ही लेता है। लेकिन जब बरसात होती तो उसके छेदों के अंदर से बरसात की बुंदे टपकती रहती थी। और एक वो पीले रंग की काबर चिड़ियाँ उन छेदों के अंदर बैठ कर क्‍या शेर मचाती थी। बस देखते ही बनता था। और एक उसे उड़ाया भी नहीं जा सकता था। क्‍योंकि पिरामिड अंदर से बहुत उँचा था। और अगर उस पर कोई कंकर फेंकी जाये तो वह फैंकने वाले को भी लग सकती थी। किसी तरह से ताली वगैरह बजा कर उसे डराया जाता पर वह थी बड़ी ढीठ। उड़ने का नाम ही नहीं लेती थी। उसकी की....की......की....पूरे ध्‍यान में चलती रहती थी।
      मैं देख रहा था की इन दिनों मम्‍मी पापा को कुछ आराम मिल रहा है। एक तो रामरतन मित्र नहीं है। और एक कोई ध्‍यान करने वाला भी नहीं आता। शायद काम के चलने की वजह से सब समझ गये थे की अब ध्‍यान का कमरा तो टूट गया। जब बनेगा तो देखा जायेगा। पकी पकाई सब खाते है हाथ कौन जलाये। खेर चलो जैस भी हो। पर इन दिनों घर में बहुत शकुन था। खाना खाने के बाद मम्‍मी पापा जी के साथ दो घंटे मैं भी मजे से सो लेता था। लेकिन एक बात थी रह-रह कर मुझे अपनी मां की बहुत याद आती थी। क्‍या ऐसा नहीं हो सकता की मैं एक बार उस जगह और पहूंच जाऊं जहां मेरी मां मरी थी। परंतु वह जगह मेरी देखी भाली नहीं थी। पापा जी एक बार देख लेते तो जरूर उसे पहचान लेते। परंतु पापा जी तो कभी वहां गये नहीं थे। तो क्‍या किया जाये। बरसात ऋतु खत्‍म हो रही थी,और अभी भी मौसम में गर्मी थी। धूप निकलते ही सूर्य भगवान अपनी महिमा दिखानी शुरू कर देता था। पड़नी शुरू हुई थी। होली का त्‍योहार आने की तैयारी कर रहा था। चढ़ते बंसत का सुंदर मौसम थ। और यही दिन इतनी सुहाने होते है की आप कुछ देर के लिए धूप में बैठे और फिर कुछ देर छांव में धूप से जब हम छांव में बैठते है तो कैसी मीठी ठंडक महसूस होती है छांव में। और कुछ ही देर में आपको सीतलता चारों और से घेर लेती है ओर तब आपका मन करता है कि अब फिर घूप में बैठा जाये। और इन दिनों जंगल का तो आनंद ही अलग था।
      पुराने पत्‍ते टूट कर गिर गये होत है। और नये आने की तैयारी कर रहे होते है। बस इन दिनों पलाश पर यौवन आया हुआ था। और भी जंगली पेड़ो पर फूल खिले थे। कुछ जंगली झाड़ियों पर मौसमी फल भी लगे थे। कुल मिला कर इन दिनों अगर जंगल में न जाया-जाये तो जरूर कुछ अधूरा रह जाता है। सो छुट्टी वाले दिन एक पंथ दो काम वाला दिन होता था। घर से खाना बना कर सब लो जंगल की और चल देते थे। शायद इन दिनों बच्‍चों के स्‍कूल के पेपर होने वाले हो इस लिए कुछ खेला नहीं जाता था। सब अपनी किताबें साथ ले लेते थे और धूप में बैठ कर खुब पढ़ाई की जाती थी। दीदी मम्‍मी के साथ पहले कपड़े धुलवाती। पापा जी भी उन लोगों की मदद करते। चलते पानी से आप बहुत जल्‍द कुछ भी काम कर सकते थे। और पानी इतना ठंडा होता था कि पैर सून हो जाते थे। परंतु एक आनंद इन दिनों और लिया जाता था। सब नहाते थे। मुझे भी नहलाया जाता था। मम्‍मी-और दीदी दूसरे घाट पर जाकर छुप कर नहाती थी। पापा जी के साथ मैं और बच्‍चों नहाता थे। बच्‍चे क्‍या एक मैं भी एक बार तो ठंड के मारे कांप जाता था। एक तो खुला स्‍थान और उपर से इन दिनों हवा जरूर चलती थी। दोनों  मौसम परिवर्तनों के मध्‍य में हवा अपना उतर दाईत्‍व खुब निभा रही थी। परंतु एक बता थी घर पर जब नहाते तो पानी से डर लगता वह कम होता  था। और ठंड भी लगती परंतु यहां अधिक पानी होने के कारण न जाने क्‍यों कुछ देर ही ठंड लगती फिर आप  कितनी ही देर नाह सकते हो। पहले-पहल तो बच्‍चे कुछ कांपते। फिर मजे से गुप्‍ची लगा-लगा कर नहाते। पापा जी सब को साबुन लगा-लगा कर छोड़ देते। सब साबुन के बाद मजे से नहाते। और मैं पानी में छपाके मार- मार कर सब के साथ खूब मस्‍ती करता और कहने की कोशिश करता की देखो मुझे जरा ठंड नहीं लग रही हालांकि मुझे अधिक ठंड लगती थी कयोंकि मेरे बालों का कंबल तो पूरा का पूरा भीग जाता था जो सूखने में काफी समय लेता था। स्‍नान के बाद सब धूप में बैठ कर गरमा-गर्म चाय जो घर से बना कर लाई गई होती थी सब पीते थे। बस मैं और हिमांशु भैया चाय नहीं पीते थे हम तो दूध ही पीते थे। खेर मेरा तो क्‍या मुझे तो मीठा कुछ भी मिल जाये पी सकता हूं परंतु मुझे चाय दि ही नहीं जाती थी। और इस बीच मैं अपनी ठंड को कम करने के लिए या अपने गिले बदन को सुखाने के लिए अपने दिमाग का इस्‍तेमाल करता और पास ही नरम मुलायम रेत में खूब उपर टांगे कर के गधा लोट मारता। और मेरी इस हरकत पर सब अपना सर पीट लेते की देखो पोनी को और नहलाओ शैंपू से वह मिट्टी में सब खराब हो गया। परंतु यह प्राकृतिक स्‍नान था। जो कुछ ही देर में बालों से झड़ जाता और शरीर के अंदर किसी प्रकार के जीव जंतु भी उसके साथ गिर जाते देखा न मेरा दिमाग एक पंत दो काम।
      खुली घास में  चारों और कपड़े सूखी दिये जाते थे। जिनकी देख भाल करना मेरी जिम्‍मेदारी थी। सच बात तो यह थी कि मुझे लगता भी था कि मैं कुछ तो काम कर सकता हूं या मुझे कम से कम कुछ तो काम मिला। वहीं पर एक साफ सुथरी जगह देख कर एक बड़ी सी चादर बिछा दी जाती। जिस पर हम सब बैठ कर खाने का इंतजार करते थे। जगह भी वह खास  चूनी जाती थी जहां पर सूर्य भगवान खूब चमक दे रहे होते थे। मैं जानता था कि अब कुछ ही देर में मम्‍मी जी खाने का पिटारा खोलेगी और मेरे मजे आ जायेगे। न जाने खाने का नाम सून कर ही मुझे क्‍या कुछ हो जाता है। पता नहीं मुझे ही होता है या हमारी मेरी पूरी जाती इस की दीवानी है। इतने सालों कितना स्‍वादिष्‍ट खाना खाने को मिला है, फिर भी हमारी नीयत नहीं भरती। शायद इस लिए ये गाली सिर्फ हमारे लिए ही बनी है। ‘’ खोने का कुत्‍ता‘’ कितनी बुरी बात है। परंतु इस समय ये सब बातें याद कर मैं अपने खाने के आनंद को कम नहीं करना चाहता। अरे खाना यानि खाना और क्‍या भला जिंदा रहना है कि नहीं।
      आज का खाना बहुत मजेदार था चाऊमिंग न्यूडल लाई गई थी। क्‍या मजेदार चीज थी। मुहं से पकड़ कर अंदर करते जाओ खत्‍म होने का नाम ही नहीं लेती थी। परंतु होती बड़ी लजीज थी। और वह भी मम्‍मी जी के हाथ की। मम्‍मी जी के हाथों में कुछ जादू था वह जिस खाने को हाथ लगा देती वह कितनी स्‍वादिष्‍ट हो जाती थी। खाना खाने के बाद मम्‍मी पापा कुछ देर के लिए धूप में लेट गये और बच्चे थे कि उन्‍हें कहां आराम करना था। वह इधर उधर झाड़ियों में कुछ जंगली फल तोड़-तोड़ कर खाने लगे। अब मेरी डयूटी अधिक हो गई एक तरफ तो कपड़े का ध्‍यान रखना मम्‍मी पापा भी आंखें बद कर धूप में लेटे है। और दूसरी और इन बच्‍चों को देखना इस लिए मैं जंगल में खाना खाने के बाद आराम नही करता था। कभी बच्‍चों के पास कभी मम्‍मी पापा के पास। बच्चे जंगली फल तोड़ रहे होते तो मैं उनके पास जाकर खड़ा हो जाता। वह समझते की मैं भी मांगने के लिए आया हूं। और एक दो फल मुझे भी खिला दिये जाते कभी-कभी तो मैं उन्‍हें लेता भी नहीं था। कि ये सब मुझे नहीं चाहिए तुम ज्‍यादा दूर मत जाओ। जानते हो जंगल कितनी खतरनाक है। परंतु वह मेरी एक नहीं सुनते थे। काश उन्‍होंने मेरी मां का हाल देखा होता तो उन्‍हे पता चल जाता। और मैं इस बीच वह जगह देखने की कोशिश भी कर रहा था जहां पर मेरी मां मरी थी। क्‍योंकि पानी तो में इसी नाले से लेकर के गया था।
      इसी बीच क्‍या देखता हूं कि एक गीदड़ दूर झाड़ी की ओट से हमे देख रहा है। अब मेरी समझ में आया कि मम्‍मी पापा जब भी जंगल में आते तो दो बड़ी ब्रेड क्‍यों लेकिन आते थे। इन पाजियों के लिए लेकिन इन्‍होंने तो मेरी मां.......तभी अचानक मेरे दिमाग में एक शैतानियत आई में चुप चाप धीरे-धीरे उस गीदड़ की और बढ़ने लगा। मैं अब उस गीदड़ के एक दम पास था। हवा का रूख भी गीदड़ की तरफ से मेरी और आ रहा था। इस लिए वह मेरी खुशबु भी नहीं ले पाया। उसे क्‍या पता है कि अब मेरी उपर हमला होने वाला है। मैंने मन ही मन कल्‍पना कर ली कि इन्‍हीं लोगों ने मेरी मां को मार है....इन्‍हें में जीवित नहीं छोडूंगा। बस फिर क्‍या मैं बीजली की तेजी से उस पर झपटा। वह इस हमले के लिए कतई तैयार नहीं था। वह बचाव के लिए दो कदम पीछे की और हटा। तभी मैंने उसे पीछे से पकड़ लिया उसने भी पलक झपकते ही अपने छरहरा बदन को पल में छुड़ा लिया और सुरक्षा के लिए अकड़ कर खड़ा ओ गया। उसके दो और झाड़ीया थी और सामने में खड़ा था। बच्‍चे भी इस लड़ाई की आवाज सून कर इधर ही देखने लगे।  कुछ देर हम इसी अवस्‍था में खड़े रहे। परंतु मुझ में सब्र नही था। मैंने उस पर उछल का हमला किया आरे उसकी गर्दन पकड़ ली इस सब के लिए वह तैयार नहीं था वह तो भाग जाने का रास्‍ता देख रहा था। कि किसी तरफ से भागू। अब वह छटपटाने लगा। मैंने उसे नीचे गिरा लिया और उसे अच्‍छी तरह से रगड़ने लगा। मैं आज उसका कचूमर निकाल देना चाहता था। इस आवाज को सून कर पापा जी डंडा लेकिर भागे। और वह पल में ही हमारे पास आ गये। मैं उसकी गर्दन को पूरे जोर से पकड़े हुए था। वह छुड़ाने के लिए जी जान से कोशिश कर रहा था। परंतु छुड़ा नहीं पा रहा था। उसके मुंह से खाऊ.....खाऊ की आवाज आ रही थी, शायद उसका दंग घुट रहा था और उसे स्‍वास लेने में तकलीफ हो रही थी। पापा जी समझ गये की उसकी जान खतरे में है। उन्‍होंने दो तीन बार आवाज दे कर मुझे हटने के लिए कहा। परंतु मैं कहां उन की बात सुनने वाला था। तब उन्‍होंने वह डंडा मेरे ओर उसके बीच इस तरह से डाला की डंडा मेरी गर्दन में चुबने लगा। इस से मेरे दांतों की पकड़ ढीली पड़ गई और मेरा ध्‍यान भी पापा जी की और चला गया की उन्‍होंने मुझे डंडा क्‍यों मार मारना था तो इस गीदड़ के बच्‍चे को मारते जो। बच्‍चों पर भी हमला कर सकता था। इस सब के बीच गीदड़ अपनी जान बचा का झाड़ियों की और भागा में भी उसके पीछे भागा परंतु वह छोटे कद का था इस लिए झाड़ियों के नीचे से बड़े मजे से निकल कर भाग गया। आखिर वह यहां का चप्‍पा-चप्‍पा जानता होगा। और मैं अनाड़ी वह खिलाड़ी परंतु आज तो में उस खिलाडी का खेल खत्‍म कर ही देता। मेरे जलते बदन को कुछ तो शांति मिल जाती । और में पछताता और गुस्‍से में पापा जी के पास आ गया। हालांकि वह भी मेरे पीछे दस बीस कदम भागे थे। कि ऐसा न हो की गीदड़ों का झुंड मुझ पर हमला न कर दे।
      परंतु मेरी समझ में यह बात नहीं आ रही थी की आखिर पापा जी ने मुझ हमला क्‍यों किया। वह मेरी दुश्मन था। और बच्‍चों के इतने पास था। जो इस बात को जानते भी नहीं थी। कि खतरा उनके इतनी पास है। फिर उनमें से किसी ने मेरी मां को भी मारा था। उस घायल किया था....मेरे मुंह से तेज सांस के साथ लार भी टपक रही थी। मैं मम्‍मी जी के पास जाकर बैठ गया। इस सब के बीच मम्‍मी जी भी पूछ रही थी कि क्‍या हो गया मुझे भी तो पता चले। पापा जी और बच्‍चे बाद में वहां पर आये। मम्‍मी जी मुझे प्‍यार कर रही थी और मुझे पीने के लिए पानी भी दिया। परंतु में नीची गर्दन किये पास ही बैठा रहा। इतनी देर में बच्चे ओर पापा जी आ गये और वह कहने लगे की देखो मम्‍मी जी आज पोनी ने एक गीदड़ को पकड़ कर नीचे गिरा लिया और अगर पापा जी नहीं आते तो वह उसे जान से मार देता। पोनी कितना ताकत वर हो गया है। पापा जी मेरे पास आकर बैठ गये और मेरे बदन पर हाथ फैर कर देखने लगे की कहीं मुझे भी तो एक आध दाँत का घाव तो नहीं हो गया है। क्‍योंकि वह जानते थे की ये जंगली जानवरों के थूक में हम पालतू जानवरों से अधिक जहर होता है। परंतु मैं तो इस सब से अनभिग था और अपना गुस्‍सा पाप पर दर्शाने के लिए दूर जाकर बैठ गया। पापा जी समझ गये कि मैं उनसे नाराज हूं।
      पापा जी ने मुझे देखते हुए कहां की इसे देखो जंगल में आकर तो यह अपना रूप रंग ही बदल लेता है। ये हो न हो किसी भेड़िया की औलाद होगा। तभी तो इतना खतरनाक है। देखा तुम लोगों ने गीदड़ को क्‍या गांव के पालतू कुत्‍ते पकड़ सकते है। इतनी चपलता और चालकी उन में कहा है वह तो देख कर भौंकना शुरू कर देते। और यह इतना चालाक है कि शिकार को देख कर उस पर धात लगाता है। उसे डरा कर भगता नहीं। ये परवर्ती जंगली जनावरों में ही होती हे। मेरी तारीफ के क़सीदे पढ़े जा रहे थे। जिस में मुझे जरा भी मजा नहीं आ रहा था मजा तो तब आता जब मैं उस गीदड़ को फाड़ देता। मेरे दाँत कुल मूला रहे थे।
      और ये बात सत्‍य भी की मैं जंगल में जाकर अपनी ताकत भी अधिक महसूस करता था। गांव के कुत्‍तों के साथ एक प्रकार का भय बना रहता था मेरी मन में। एक अकेला पन का कि यहां पर मेरा कोई नहीं है। परंतु यहां भी तो मेरा कोई नहीं है। फिर भी ऐसा क्‍यों महसूस नहीं हुआ। खेर पापा जी की बात में दम जरूर था। ये जंगल ये हवा मुझे एक अपने पन का अजीब सा साहस देती है। परंतु अब तो मेरा यहां कोई भी नहीं है। मेरी मां भी मेरी आंखों के सामने दम तोड़ कर मर गई। भाई बहनों का क्‍या पता कहां पर है। हैं या नहीं है। और उन के व्‍यवहार के बारे में मैं क्‍या जानू वह भी मुझे अपना दुश्‍मन समझ सकते है। नहीं यहां मेरा अपना कोई नहीं है। अब यही मनुष्‍य का परिवार ही मेरा अपना परिवार है। ये मुझे कितने प्‍यार दुलार से अपने पास रखता है। मेरे नाज नखरे भी उठता है। मुझे खाने को देता है। देते ही नहीं,  जो खुद खाता है वही खाना मुझे देता है। और मां तो सच यही है जिस ने मुझे पाला है। वह तो प्रकृति की एक पकड़ है और ये तो यशोदा है पाला पोसा और प्‍यार इसी ने दिया है। यही जननी से भी महान है। और मैं पल में सब भूल भाल गया और मम्‍मी जी के पास जाकर उनके हाथ चाटनें लगा। उन्‍होंने मुझे प्‍यार किया मेरे बदन पर प्‍यार से हाथ फेरा परंतु आज तो मैं उन्‍हें अपने में समा लेना चाहता था और मैंने आने दोनों पैर मम्‍मी जी के कंधे पर रख लिये और प्‍यार से उसका मुख चाट गया.......सब जोर-जोर से हंसने लगे। कि पौनी मम्‍मी को बैटा बन गया हिमांशु भैया रह गया। और इस हंसी खुशी के माहोल में घर चलने की तैयारी होने लगी। सब कपड़े उठा कर एक जग बाँध लिए गये। और हम नाचते कूदते अपने घर की और चल दिए। उस मुलायम रेत पर मैं आज भी सबसे तेज भाग रहा था........परंतु कभी-कभी रूक कर वहां पर छपे पैरों के निशान सूँघने लग जाता था। उस समय मुझे कानून मंत्रि की संज्ञा दी जाती थी।
क्रमश: अगले अंक में.......
स्‍वामी आनंद प्रसाद  मनसा

पोनी--एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा—(अध्‍याय—25)

(मेरा दुस्साहस और पापा का साहस)

    घर जाते-जाते दिन निकल आया था। चारों और चहल पहल थी। परंतु मेरी और किसी का ध्‍यान नहीं गया। बस एक आधा गली के कुत्‍ते ने देख और स्‍वभाव अनुसार मुझे भौंका। लेकिन ये केवल उनके संदेश मात्र ही माना जायेगा। कि हम सतर्क है अपने इलाके में। हमारी नजरों से कोई बच कर नहीं जा सकता। बस वह बैठे-बैठे ही भोंकते रह, परंतु वह भी आगे आने कि हिम्‍मत नही कर सके। मैं घर जाने  का एक ही रास्‍ता जानता था। पीछे की तरफ से जहां से अक्‍सर में भागने  के लिए तो उपयोग करता था। परंतु  छत से घर जाने  के लिए वापसी में बहुत कठिन होता था। क्‍योंकि उपर से तो 8-10 फीट भी कूद कर आ सकता था परंतु वापस तो इतना कूद कर चढ़ नहीं सकता था। अपने साथ मामी का मकान था। मैं वहीं पर अक्‍सर पहूंच जाता था। वहीं अपनी हीरों कुत्‍ते वाली कथाएं। परंतु आज ऐसा कुछ नहीं कर सका। केवल छत पर खड़ा हो कर रोता रहा। कि मुझे कोई उतरा लो। मामी हमारे घर पर गई और मम्‍मी जी को बुला कर कहने लगी तोहरा पौनी आया है। गली में आज भी भीड़ लग गई थी। परंतु मेरे उपर से न कूदने के कारण लोग तरह-तरह की बातें कर रहे थे। लगता है हीरों कुत्‍ता अब बूढ़ा हो गया है।
मम्‍मी ने दीदी को कहा की पोनी आज उतर नहीं पा रहा। और लकड़ी की सीढ़ीयों से तू उतार नहीं सकेगी। इस लिए पीछे से जाकर जय नारायण का दरवाजा  खोल कर उसे उतार ला। मेरे दो दिन से घर न आने के कारण सब घर के लोग उदास हो गये थे। दीदी और बच्‍चे मुझे आया देख कर खुश हो गये। पड़ोस के घर से चढ़ कर दीदी मेरे पास आई तब मुझे बड़ा अचरज हुआ कि दीदी कहां से गई। उसने मुझे चैन से बांधा। और मेरे गले से चिपट का रोने लगी कि तुम कहां चले गये थे। हमने तुझे कहां-कहां नहीं खोजा। वह स्‍कूल के कपड़े पहने थे। उसको ऐसे रोते देख कर मेरा भी दिल भर आया कि देखो मनुष्‍य कितना प्रेम वाला है। मुझे भी ये लोग कितना प्‍यार करते है। जब आपको कोई प्‍यार करता है तो आपको एक खास तरह का गर्व होता है। परंतु उसे अहंकार नहीं बना लेना चाहिए। उसमें एक तरलता ही सौंदर्य पूर्ण होती है वहीं आपको विलय की और ले जाती है। एक मिटने की और जो सच एक अभूत पूर्ण आनंद का क्षण होता है।
      पीछे का दरवाजा मैंने देखा तो था परंतु वह हमेशा रात को बंद होता है इस लिए उस रास्‍ते से मैं घर नहीं आ सकता। मम्‍मी ने मेरे लिए गर्म-गर्म दूध डाल रखा था। दो दिन से कुछ खाया नहीं था। परंतु उस दूध को देख कर मुझे रह-रह कर मां की याद आ रही थी। वरूण और हिमांशु भाईयाँ भी मुझे देख कर खुशी के मारे पागल हो गये। और मुझे चारों और घेर लिया कि बताओ तुम दो दिन कहां रहे।  हिमांशु ने कहां की पोनी अब शैतान हो गया है। अब ये हमारे बस के बाहर है। परंतु ऐसा कुछ नहीं था। क्‍योंकि अगर मुझे मेरी मां नहीं मिलती तो मैं सुबह ही आ जाता। और कुदरत शायद यही चाहती थी। उसने अंतिम समय मुझे मेरी मां से मिला दिया ये क्‍या कम उपकार है उसका। सच कहूं तो कुदरत मुझ पर बहुत अधिक मेहरबान है। हर मोड़ पर, इस परिवार से जोड़ा में भी तो उसी का हाथ....इसे किस्‍मत नहीं कहा जाना चाहिए। जरूर मैंने कुछ ऐसा किया कि कभी कोई प्रेम का बीज बोया होगा। उसके बदले ये सब मिला। शायद इस जन्‍म में मेरी मां भी ऐसा बीज बो कर गई। की अगले जन्‍म में उसे कोई महत्‍व पूर्ण परिवार मिले जिस की वह पात्र थी।
      लेकिन सब देख रहे थे कि पोनी कुछ बदला-बदला जरूर लग रहा है। परंतु शायद बाल मन के कारण मेरे ह्रदय में जो उथल-पुथल चल रही थी वह उनकी समझ के परे थी। मन कुछ खिन्‍न था। मेरे सामने दूध से भरा कटोरा रखा था। मम्‍मी और सब बच्‍चे मुझे प्यार कर रहे थे। मैं भी एक दम से सही समय पर घर आ गया और कुछ देर से आता तो बच्‍चे स्‍कूल चले जाते और नाहक मेरी याद में एक ओर दिन उदास रहते । अब उनके चेहरे पर एक ताजा खुशी थी। बच्चों को स्‍कूल जाने के लिए देर हो रही थी। इस लिए सब मुझे बाए-बाए कर के भारी कदमों से स्‍कूल की और चले गये। वरना तो शायद मेरे आने की खुशी के कारण वह आज स्‍कूल से जरूर नागा कर लेते....लेकिन शायद दो दिन से पहले ही स्‍कूल की छूटी होने के कारण किसी की हिम्‍मत नहीं हुई।
      मैं दूध के कटोरे के पास बैठ गया। इस समय घर पर और कोई नहीं था। मैंने कटोरे में झांक कर देखा। मुझे मेरी मां की छवि दिखाई दी। जैसे वह मुझे देख रही है। और वह मुस्‍कुरा रही है। परंतु ये सत्‍य नहीं हो सकता। काश ये दूध मुझे वहां मिल जाता तो मैं इसे अपनी मां को दे देता। दूध और दवा पाकर वह शायद जीवित हो जाती। पर ये सब मेरे सामर्थ्य के बाहर था। परंतु सच मां मुझे जीवित देख कर कैसी प्रसन्न थी। मैंने दूध को पीना चाहा। परंतु आज लगा गला कुछ भरा-भरा सा है। कुछ अंदर नहीं जा रहा था। जैसे किसी ने उसे बंद कर दिया है। हां ऐसा एक बार और हुआ। वह जब मैं मर रहा था वो घटना समय आने पर आपको बताऊंगा। क्‍योंकि जब आपको मृत्‍यु घेर ले तो वही सब प्रतिक्रिया घटित होने लग जाती है। खेर दूध अंदर नहीं गया तो में पास रखी बालटी में जाकर पानी को पिया। ये चमत्‍कार है। पानी मृत्‍यु के एक क्षण पहले भी कोई प्राणी पी सकता है। लेकिन दूध भी उतना ही तरह है लेकिन वह आपके कंठ से नीचे नहीं जाता। पानी पाने के बाद मुझे कुछ राहत हुई। में वही धूप में लेट गया। पूरा घर सूनसान था। केवल में और मेरी तनहाई चारो और फैली हुई थी। मम्‍मी के जाने के काफी देर बार दरवाजा खुला। मैने देखा पापा जी आ रहे है। पापा जी को देख कर एक तो मुझे भय लगा। फिर कुछ अपने पन का भी एहसास हुआ। परंतु भय की मात्रा आज कम थी। आज पीड़ा में अपना पन उस पार छाया हुआ था। पापा जी पास आकर मेरे पार बैठ गये। मैंने अपनी पूंछ जोर से हिलाई। पापा जी ने मेरे शरीर पर हाथ फेरा। मानों मेरा पूरा शरीर पीड़ा से भरा था। एक जलती पीड़ा। मैंने आंखें बंद कर ली। और पापा जी का वो स्‍पर्श मुझे शांत किए जा रहा था। कुछ ही क्षण में मेरी सारी पीड़ा न जाने कहा गायब हो गई। एक अनोखा चमत्कार की आपको जब कोई सहला रहा हो तो मात्र उसके स्‍पर्श से ही आप एक नई उर्जा के संचार को महसूस करे। और प्राणों से खालीपन को आप पल भर में प्राणों से लबालब भर जाये।
      मैंने आंखें खोली उनमें एक दर्द था, एक टीस थी। अपने किसी के खोना का एहसास था। जो पापा जी ने शायद देख लिया। और मेरी आंखों से झर-झर आंसू बहने लगे। मैंने पापा जी की गोद में सर रख दिया। अब ये मैं नहीं कह सकता की पापा जी मेरे दूःख को समझ पाये या नहीं परंतु इतना तो सत्‍य है कि मैंने अपना दु:ख पापा जी से बांटा। और उन्‍होंने उसे आत्मसात किया। मैंने प्‍यार से उनके हाथ को चाटा। उन्‍हें दांतों से पकड़ा। और अपने अंदर का भरा दर्द बहार पापा जी की झोली में डाल दिया। कैसे मैं पल में ही निर्भर हो गया। पर शायद मैं लाचार था अपना दर्द में जब तक सहता रहा उस चुबे कांटे की तरह। जो मेरे शरीर के अंदर गड़ा था। और वह पल-पल गहरा होता जा रहा था। उसे निकालने के लिए मेरे पास ह्रदय था परंतु शब्‍द नहीं थे। अब पापा जी को पास पाकर वह अचानक दर्द पिघल तरल हो गया। और आँखो और छूआन के माध्‍यम से बाहर फैल गया। शायद शब्दों के बिना भी बहुत कुछ कहा जा सकता है। हम पूरी पृथ्‍वी पर कौन प्राणी शब्‍दों का इस्‍तेमाल करते है। मनुष्‍य को छोड़ कर। परंतु ये कुदरत के खिलाफ एक विक्रिति है। जिस के जंजाल में मनुष्‍य ने खुद आपने आप को फंसा लिया है।
      वो मेरे अंतस का दर्द था। अगर बाहर का दर्द होता तो जरूर बहार से सहायता मिल सकती थी। मैं रो सकता था, तड़प कर चाट कर बता सकता था की मुझे यहां चोट लगी है। लेकिन अब तो वही वैध उसे ठीक कर सकता था। जो केवल नब्ज देख कर रोगी का दर्द पहचान सकता हो। और इत्तफाक से पापा जी ऐसे वैद्य थे। पापा जी मुझे प्‍यार करते रहे। और आखिर मुझे उठ कर वह दूध पीनी ही पडा, किस अद्भुत शक्‍ति ने ये सब मुझ से करवाया और कैसे। ये सब मेरी समझ के परे था परंतु ये था एक चमत्‍कार ही। मरे मन से न चाहते हुए भी एक सम्‍मोहन की अवस्‍था में मैंने दूध पिया। दूध पीने के कुछ ही देर में उस दर्द को भूलने लगा। पापा जी मेरी और देख रहे थे। उनके चेहरे पर एक खस तरह की मुस्कुराहट फैली हुई थी। जो मेरे दर्द पर मरहम का काम कर गई।
      धीरे-धीरे मन इस हादसे को भूलता चला गया। मन का स्‍वभाव बड़ा विकट है। इससे जितना दूर जाया जाये उतना ही जीवन सूख और आनंद से गुजरता है। एक याद तो मन पर छपी रही परंतु वह दुःख और पीड़ा कम से कम होती चली गई। घर मैं पिरामिड बनने का काम चल ही रहा था। वह काना मजदूर। जिस का जिक्र मैंने पहले भी किया था। पांचु, वह शक्‍ल से ही चालबाज और धूर्त लगाता था। परंतु उसके अंदर एक गुण जो सारे अवगुणों को दबा देता था वह मेहनती था। वह कामचोर नहीं था। इस लिए शायद यहां पर वह काम कर सकता। वरना मेरे देखते कितने ही मजदूर जो काम चोर थे। वह 10-15 दिन तक अपनी चालबाजी दिखाते रहे। और जब जूबान से काम नहीं चला। लिपा पोती नहीं चली जो भाग गये। उन्‍हें किसी ने भगाया नहीं। परंतु काम ही ऐसा था कि जो जरूरी है वह तो होना ही चाहिए। कोई बड़ा चौड़ा फैला काम तो नहीं था कि उसमें कुछ काम चोर भी खप जाये। असल में यहां जो भी काम होता वह प्रत्‍यक्ष था1 उसके कुछ सफाई देने की जरूरत नहीं था। और न ही किसी को दिखाने की। पूरा दिन पांचु इँट लाकर इक्कट्ठे करता। क्योंकि गली भिड़ी होने के कारण इंटो का ट्रक यहां नहीं आ सकता था। 12बजे तक पांचु वह इँट घर के आँगन में ढेर लगा देता था। पापा जी 11 बजे तक दूकान से घर आते थे। फिर उसके बाद कपड़े बदल कर पांचु की मदद करते। इन दिनों ध्‍यान नहीं होता था। क्‍योंकि ध्‍यान का कमरा तो टूट गया था। अब तो जब तक वह नहीं बन जाता से तो संभव ही नहीं था। इतनी सारी इँट धीरे-धीरे कर के उपर चढ़ानी होती थी। काम बहुत मेहनत था।
      अंगन से पांचु एक हाथ से इँट उपर फेंकता। पहली मंजिल पर पापा जी उसे लपकते। मुझे तो यह देख कर डर लगता था। अगर वह इट लग जाये या आपका ध्‍यान चूक जाये तो आपको चोट भी अधिक लगा सकती है। परंतु पांचु के साथ पापा जी भी गजब के खिलाड़ी निकले। क्‍या गजब की इँट फेंकी जाती। और पापा जी उसे एक हाथ से लपक कर रखते जाते। कैसा तालमेल था दोनों का। पाप जी भी विकट थे। किसी भी काम को कितनी सहजता से कर लेते थे। फिर उन इंटो को उठाकर अंदर पिरामिड में ले जाया जाता। और एक-एक करके पेड़ दर पेड़ उन्‍हें वहां रखा जाता जहां आज काम होना था। राम रतन मित्र। चार बजे के बाद घर आते थे। शायद वह कोई दूसरा काम भी कर रहे थे। फिर चार या पाँच बजे के बाद। वह दो तीन घंटे काम करते। काम बस यही होता की उन इंटो के तीन रद्दे ही लगाये जाते। इंटो को खसके की तरह बहार-बहार बढ़ानी होती थी। करीब दो इंच मात्र। तो इस के एक दिन में केवल तीन चक्र ही लगया जा सकते थे। अगर ज्‍यादा लगने का लालच करोगे तो सब इंटे नीचे गिरने का डर भी रहता था।
      काम काफ़ी खतरनाक और जोखिम भरा था। परंतु जिस सहज और सरलता से पापा जी उस में खड़े होकर करवा रहे थे। वह एक दम आसान हो गया था। पहले दुकान भी देखते और इन लोगो के साथ मदद भी करते। रात होने के कारण रोशनी का भी इंतजाम किया जाता था। परंतु एक बात थी इस सब के कारण मुझे बहुत मजा आता था। एक रौनक मेला लगा रहा था रात तक। और इस सब के कारण मैंने एक काम ओर सीख लिया था। कहो तो बता दूं परंतु आप समझोगे कि में उड़ा रहा हूं। परंतु यह एक दम सत्‍य है। मैं इस लकड़ी की सीढ़ी पर चढ़ना भी सीख गया था। अगली दोनों टांगें फँसाता रहता और धीर-धीर संतुलन कर के उपर और उपर चढ़ता रहता। इतनी पतली लकडी की सीढ़ी पर अपने छोटे-छोटे पिछले पैर कैसे में संतुलन करके चढ़ना सिख रहा था। ये कोई सर्कस से कम नहीं था। परंतु ये था एक दम सत्‍य ही। परंतु कोई भी काम साहस से अधिक बढ़ कर किया जाये तो वह खतरनाक भी हो सकता था। पिरामिड धीरे-धीरे उपर उठ रहा था। तो इसकी पेड भी उँची और ऊँची उठती जा रही थी। इसी तरह पापा जी, पांचु और राम रतन के साथ मिल कर एक सीढ़ी बनाई जो करीब 18-20 फिट की थी। सीढी पैड बांधने के लिए इस्‍तेमाल होने वाली दो मजबूत बल्‍लीयां ली गई। और बल्‍ली की लकड़ी काट कर उसके डंडे लगाये गये जो। साधारण सीढ़ी से उँची और माटी भी थी। साधारण सीढ़ियाँ 8-10 फीट की ही होती थी जो आम तोर पर बांस की ही बनी होती है।। अब जो पेड़ बंधी और उस पर मचान बनाया गया वह 20 फीट का था। वह एक ही सीढ़ी वहां सीधी लगा दि गई। और पहली पेड़ को बीस फीट उँचा बाँध दिया गया। वरना तो उतनी जगह में करीब तीन पेड़ बांधी जाती जिस पर नीचे से सारी इंटे फेंक कर इकट्ठा करना आसान नहीं था। अब पहली पेड़ पर जो 20 फिट थी उस पापा जी बैठ जोते और पांचु नीचे से इंटे फेंकता। और पापा जी उन्‍हें लपक कर वहाँ सहेजते जाते। फिर पैड-दर पैड उन्‍हें उपर ले जाना थोड़ा आसान हो जाता था। एक दिन ऐसा हादसा हुआ की मैं बहुत डर गया। क्‍योंकि जब इंटे उपर फेंकी जाती तो मुझे पिरामिड में अंदर नहीं आने दिया जाता था। क्‍योंकि कभी-कभी भूल से या चूक से वह इँट वास जमीन पर गिर जाती थी। या तो पांचु ने उसे छोटा या गलत फेंका था या पापा जी उसे पकड़ने भूल कर गये।  और वह इँट जब नीचे गिरी तो कितनी भंयकर आवज करती थी। पूरा का पूरा घर हिल जाता था। इस तरह से नीचे खड़े व्‍यक्‍ति को इतनी चोट लग सकती थी कि वह मर भी सकता था। काम काफी खतरनाक था। इस लिए उस समय दरवाजा बंद कर दिया जाता था कि मैं भूल से भी वहां न आ सकूँ। इस लिए जब वह काम चल रहा होता तो मुझे अंदर नहीं आने दिया जाता था।
      परंतु उस दिन क्‍या हुआ। इंटे सारी की सारी उपर मचान पर फेंक दी गई थी। और सब लोग मचान पर ही बैठ कर चाय पी रहे थे। वहां थोड़ी धूप होने के कारण धूप का आनंद भी ले रहे थे। मैं अकेला नीचे रह गया था। अब अकेले में मेरा जरा भी मन नहीं लगता था। मुझे ये बिमारी मां के मरने के बाद हुई। कोई संग साथ तो चाहिए चाहे मैं सोता हुआ हूं या जागा हुआ हूं। एक बच्‍चे की तरह पीछे-पीछे लगा रहता था। परिवार का कोई तो सदस्‍य चाहिए ही। और कुछ नहीं मिले तो मैं मम्‍मी जी का कोई कपड़ा पकड़ कर अपने पास रख लेता उसकी खुशबु के साथ सोता रहता। सब लोग ऊपर बैठे थे। मैंने एक दो बार आवाज भी देकर उन्‍हें बुलाना चाहा। परंतु शायद वह बातों में तल्‍लीन थे। या और कोई कारण हो सकता है। सीढ़ी चढ़ने का साहस तो मुझमें आ ही गया था। और धीरे-धीरे सीढी पर चढ़ने का मैं बहुत आदी हो गया था। परंतु वह एक बांस की छोटी सीढ़ी होती थी जिस पर 8-10 डंडे ही लगे होते थे। परंतु इस सीढ़ी का मुझे तनिक भी अंदाज नहीं था की यह इतनी उँची है। ये सीढ़ी उन सीढ़ियों से दो गुणी बड़ी थी। अब मैं तो अपने को मास्‍टर समझ गया और मैं सीढ़ी चढ़ने लगा। मैं चढ़ रहा था ओर वह सीढ़ी तो खत्‍म  होने का नाम ही नहीं ले रही थी। मैंने एक बार नीचे झांक कर देखा तो मैं बहुत उपर आ गया था। और मचान तो काफी दूर था। शायद में आधी से कुछ ही अधिक चढ़ा था। सीढ़ी उँची होने के कारण झूल भी रही थी। मेरा संतुलन बिगड़ रहा था। परंतु अगर मैं गिर जाता या कूद जाता तो मेरी हड्डियां चकना चूर हो जाती। जितना में हिम्‍मत कर के चढ़ सकता था चढ़ता रहा। परंतु एक समय के बाद मेरी हिम्‍मत जवाब दे गई। मैं अपने आप को वहां किसी तरह से संतुलित कर के खड़ा हो गया। और कुं.....कुं ....कर के रोने लगा। मेरा पूरा शरीर मारे भय के थर-थर कांप रहा था। और रह-रह कर मुझे लग रहा था कि अब क्‍या होगा। मेरी ओखों के सामने अंधेरा छा रहा था। शायद पापा जी या मम्मी जी चाय पी रहे थे। बातों के कारण या वो सोच नहीं सकते कि मैं ऐसा कर सकता हूं। मैं काफी देर इसी तरह से खड़ा रोता रहा। मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि क्‍या करू। कुछ ही देर में पांचु ने मेरे रोने की आवाज सूनी और पापा जी को कहा। कि पोनी को देखो कहां चढ़ा हुआ है। पाप जी तो मुझे इस हालत में देखा तो वह भी बहुत घबरा गये। परंतु उन्‍होंने साहस से काम लिया। वो उपर ही थे। अगर वह नीचे होते तो पीछे से आकर मुझे बड़ी ही आसानी से पकड़ सकते थे। परंतु पापा जी ने मुझे प्‍यार से पूकार और धीरे-धीरे उतर कर मेरे नजदीक आते गये। पापा जी के पास आने के कारण सीढ़ी और जोर से हिलने लगी। मुझे और अधिक डर लगने लगा। परंतु पापा जी मुझे बुलाते रहे। मेरा ध्‍यान अपने और खींचे रहे। ताकि मैं डरूं न। और दूसरा पापा जी पर मेरा पूरा भरोसा था। की वो जरूर आकर  कर मुझे बचा लेंगे। इस लिए उस झूलती सीढ़ी के करण मुझे कम भय लग रहा था वरना और कोई समय होता तो मैं नीचे कूद जात चाहे फिर जो भी होता इस के बारे में नहीं सोचा जाता। परंतु पापा जी की वजह से मुझे लग रहा की वह जो भी कर रहे है मेरी भलाई के लिए ही कर रहे है। इसलिए मैं जहां खड़ा था जरा भी नहीं हीला। अगर हम अपने पर अधिक भरोसा करते है तो वह हमारा मैं या अंहकार ही होता है। दूसरों पर भरोसा करना ही तो समर्पण बन जाता है। साहस है, पापा जी धीरे-धीरे कर के मेरे पार आये। उपर से झुक कर उन्‍होंने मेरे सर पर हाथ फेरा। मेरा पूरा शरीर डर के मारे कांप रहा था। फिर मुझे आराम से पकड़ कर अभी उन्‍हें मेरे से नीचे की सीढ़ी पर जाना था। जो काम बहुत जोखिम भरा था। मेरे लिए ही नहीं पापा जी के लिए। मुझे कम से कम छुए हुए नीचे जाना। और इस स्‍थिति में वह अपना संतुलन खोकर खुद भी नीचे गिर सकते थे। परंतु पापा जी ने वह कार्य ये कार्य  कर दिया, वह उपर से उतर कर मेरे पीछे से नीचे पहूंच गये। पापा जी नीचे जाने के बाद कुछ देर इसी तरह से खड़े रहे। शायद अपना संतुलन भी बना रहे होंगे। क्‍योंकि अभी तो आधा ही कार्य ही हुआ है। मुझे भी तो नीचे उतरना है वह कैसे संभव है यह मेरी समझ में नहीं आ रहा था। पापा जी ने पीछे खड़े होकर मुझे प्‍यार से बहुत सहलाया। दो-तीन मिनट तक हम इस तरह से खड़े रहे। शायद पापा जी का मेरे पीछे आकर खड़ा होने के कारण मेरा भय कम हो गया। यही शायद वह करना चाहता थे। क्‍योंकि अब अगर में गिरता भी हूं तो पीछे पापा जी है वह मुझे सम्‍हाल लेंगे। मेरे गिरने के बीच में पापा जी एक दीवार बन आ गये। अब मेरा भय मेरा कापना कम हो गया था। तभी अचानक पापा जी ने मुझे एक हाथ से अपनी गोद में उठा लिया और एक हाथ से सीढ़ी को पकड़ कर नीचे उतरने लगे। बहुत धीरे-धीरे हम नीचे आ रहे थे। मेरी जान में जान आ रही थी। लेकिन मैंने भी समझदारी से काम लिया पापा जी ने जिस तरह से मुझे पकड़ा हुआ था मैं जरा भी नहीं हिला। अगर मैं हिलता या अपने को छुड़ाने कि कोशिश करता तो हम दोनों नीचे गिर सकते थे। क्‍योंकि एक तो उलटे पैरो पापा जी नीचे उतर रह थे। दूसरा एक ही हाथ से सीढ़ी को पकड़े थे। और जो दूसरा हाथ था उस में इतना वज़न उठाये हुआ था। और तीसरा सीढी मैं और पापा जी एक समान्‍तर रेखा में आ गये थे। जिस के कारण पापा जी का सीढ़ी से दूरी अधिक हो गई थी। पर सब ठीक हो गया। हम नीचे सही सलामत पहूंच गये और पापा जी ने मुझे जैसे ही नीचे छोड़ा मैं मारे खुशी के पिरामिड दौड़-दौड़ कर पापा जी का धन्‍यवाद कर रहा था। रो-रो कर अपनी खुशी और जीवत होने का उत्‍सव भी मना रहा था। सच आज पापा जी ने जो साहस का काम किया वह मेरे लिए भगवान बन आये। और इस घटना के बाद पापा जी के प्रति मेरे मन में और अधिक श्रद्धा और विश्‍वास बढ़ गया। अगर पापा जी मुझे आग में भी कूदने के लिए कहते तो शायद में बिना किसी झिझक और भय के कूद जाता। आज भी मुझे जीवन दान देकर पापा जी ने मुझे अपना कायल कर दिया....मेरे पास धन्‍यवाद  के शब्‍द नहीं है केवल ह्रदय में आभार है....एक प्रेम है, एक श्रद्धा है......
 क्रमश: अगले अंक में.......
स्‍वामी आनंद प्रसाद मनसा

पोनी एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा—24)

(मां की मृत्‍यु ओर वो अनमोल क्षण)
    ये कैसी अनहोनी घटना थी। जो मुझे इस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया। एक तरफ मेरी घायल मां जो मृत्‍यु सैय्या पर पड़ी थी। शायद वह मुझे जीवित देख कर अति प्रसन्‍न थी। और मैं एक तरफ तो उदास था। और एक तरफ मां से मिलने का आनंद भी मुझे महसूस हो रहा था। अब समझ में नहीं आ रहा था किसे पहले मनाऊं। इस जंगल में भी मेरी मां मुझसे हृष्ट पुष्ट थी। मैं उसके पास जाकर बैठ गया। और उसके घावों को चाटनें लगा। जिन से बहकर खून जम कर सूख गया था। जख्‍म बहुत गहरे थे। गर्दन-सर और पीठ पर बुरी तरह से फाड़ रखा था वैसे तो पूरा का पूरा शरीर ही घायल कर रखा था। इन घावों को देख कर मुझे लगा उसके उपर कम से कम दस जानवरों ने एक साथ हमला किया होगा। मेरे इस तरह पास होने से और चाटनें से उसे कितना सुकून मिला ये उसकी आंखों की तृप्ति बता रही थी। वह आंखें बद कर गहरी श्‍वास ले रही थी। मानों मेरे प्रेम और छूआन को आत्‍म सात कर जाना चाहती हो।

      मैं रह-रह कर उसके सारे शरीर को चाट रहा था। जब मेरा चाटना उसके मुख के पास आया तो उसने आंखें खोल ली। और मुझे किसी प्रेम से निहारने लगा। जैसे कोई डूबता हुआ सूर्य अंतिम समय पूरी पृथ्‍वी का दृश्य अपने में समेट लेना चाहता हो। मेरा शरीर और रख रखाव देख कर वह समझ गई की मैं बहुत ही दयावान लोगों के साथ रहता हूं। कैसे प्रकृति मिटते हुए भी अपने बीज को देख कर तृप्‍त होती है। ये कैसा गुणा भाग है। जो बौद्धिकता से नहीं पढ़ा जा सकता। मैं कुं...कुं...कुं करके उसको कहना चाहता था। कि तू ठीक हो जायेगी। और मैं बहुत खुश हूं....मेरा मालिक बहुत दयावान है। मैं जा कर उसे बुला लाता हूं....वह जरूर तरी मदद करेगा। मनुष्‍य के पास एक अनोखी शक्‍ति है। पता नहीं मैं भी मरते-मरते बचा हूं.....अगर जंगल में होता तो प्रकृति मुझे कभी जीवित नहीं छोड़ती। परंतु मेरे इस भाव को सून कर एक बार तो वह बहुत खुश हुई और पल भर में ही उदास हो गई। क्‍योंकि उसके पास और अधिक समय नहीं था। वह चाहती थी की तुम जितनी ज्‍यादा से ज्‍यादा देर मेरे पास रह सकते हो रहो। यही मेरा उपचार है। शरीर के  जख्‍म की तुम परवाह न कर। इस तो मिटना ही था। तेरा इस तरह से मेरे पास आन मेरे ह्रदय की किन गहराई को छू गया। वो टीस जो कहीं अंजान सी कसक लिये थी। उस पर कैसे कुदरत ने मरहम लगा दिया। सच ये एक वैज्ञानिक तथ्‍य है जिसे मनुष्‍य बहुत गहरे से जानता है। प्रेम एक ऐसा विस्‍तार है जो पशु पक्षी, पेड़ पौधों ओर मनुष्‍य में समान रूप से बहता है। प्रेम और भावुकता ही प्रकृति के विकास का पैमाना है। जो बीज से आगे और आगे पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता जाता है। जो ह्रदय जितना उन्‍नत और भावुक होगा वह विकास क्रम में पद दर पद उँचा ओर ऊँचा होता चला जायेगा।
      और शायद यहीं मैं मां के साथ चाहता था। कि कैसे में मां के पेट से पैदा हुआ और इस जंगल से एक उन्‍नत जाती के पास चला गया। जहां मेरा विकास होना तय है। और मेरी मां मुझे जन्‍म देकर भी अभागी रहेगी। परंतु उसकी आंखों की तृप्‍ति को देख कर लगता है। वह दिल की बहुत भावुक है। मैंने मां को  कहना चाहा कि में जिस परिवार में रहता हूं वहां पर मुझे दूसरे परिवार के सदस्‍यों की तरह से ही रखा जाता है। मुझे कुत्‍ता नहीं समझा जाता। बस मेरा शरीर ही कुत्‍ते का वरना वहां मुझे वो सब मिलता है जो पूरी परिवार को मिलता है। जो वो खाते है वहीं मुझे खाने को दिया जाता है। मेरे सोने के लिए एक अलग से बिस्‍तर है। जिस पर मुलायम गद्दे है। और मैं जहां चाहे बैठ सकता हूं। बस में उनकी भाषा बोल नहीं सकता। और दो टांगों पर चल नहीं सकता। वरना उनके प्रेम में कोई कम नहीं है। मेरी मां मेरे ये भाव सून कर बहुत ही खुश हुई और उसने अपना मुख उपर की और उठाया। मैं समझ गया वह मुझे प्‍यार करना चाहती है। धीरे से मैंने अपना मुख उसके सामने रख दिया। और आँख बंद कर उसकी छुअन को महसूस करने लगा। उसने मुझे किस प्‍यार और दुलार से चाट, मैं सिहर गया। सालों पहले जब मैं मां का दूध पीता था तब भी वह मुझे इसी तरह से चाटती थी। मुझ अकेले को ही नहीं मेरे सभी भाई बहनों को बारी-बारी से। परंतु वो तो इस दुनियां में शायद नहीं है। परंतु मैं दोनों का तुलनात्‍मक विश्लेषण कर सकता हूं। कितनी सुस्‍पर्श छुअन है प्रेम की जिसे आज में महसूस कर सकता हूं...यह एक मां ही दे सकती है। क्‍या मेरी संवेदना बढ़ गई है। मनुष्‍य के संग रह कर। वरना उसी छुअन को जब पीछे जाकर याद करता हूं....तो वह मीलों दूर महसूस होती है। मेरी मां मुझे इस तरह से खुश और हृष्टपुष्ट देख कर बहुत प्रसन्‍न थी। शायद वह कह रही थी तेरी किस्‍मत...देख जंगल में पैदा होकर भी राज महलों के सूख पा रहा है। तुम अपने मालिक का वफादार बन कर रहना। जिनका भोजन खाया है उनका बुरा कभी मत सोचना। जो लोग एहसान को भूल जाते है उनकी कोई गत नहीं होती। तुम उनकी दो बात या मार भी सह लेना। परंतु उनका साथ मत छोड़ना। तब मेरी समझ में आया कि मैं अब मां को छोड़कर कैसे जा सकता हूं।
               इसी तरह से लेटे हुए कितना समय बीत गया मुझे पता ही नहीं चला। तब अचानक मुझे याद आया कि मां की कुछ मदद करनी चाहिए। मैंने देखा पास ही एक मेरे हुए जानवर का मास पडा था। जो शायद अपने खाने के लिए लाई थी या जिस के कारण उसने इतने जख्‍म खाये थे। मुझे फिर गुस्‍सा आ गया। उस अकेली और बूढ़ी पर इतने अत्‍याचार किये। अगर मैं होता तो उन्‍हें जरूर सबक सिखा देता। आज पहली बार अपनी मां की ये हालत देख कर, मुझे पता लगा की हमारा जीवन कितना कठिन है। पेट का भरण पोषण ही कितनी बड़ी समस्‍या है। मेरी मां को तो पता ही नहीं कि मुझे खाने के लिए कुछ भी नहीं करना पड़ता और तो आरे कभी-कभी तो जब मेरी तबीयत खराब होती है या अंदर से खाने को मन नहीं करता तो वह खाना दो दिन तक इसी तरह पडा रहता है और फिर उसे फेंकना पड़ता है। मेरी इस तरह से उस मांस की और देखते रहने से शायद मेरी मां समझी की मेरा बेटा भूखा है। उसने कुं...कु....कर के कहना चाहा कि तू खा ले....परंतु उसकी दुर्गंध से ही मेरा जी मिचला रहा था। अब समय और स्‍थान का कितना भेद है। मैं अपनी मां के साथ रहता तो इसी खाने को कितने चाव से लड़ झगड़ कर खाता और मनुष्‍य और वह भी शुद्ध शाकाहारी के साथ रहने से जीवन में कितना बदलाव हो गया। संगत का भी हमारे जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ता है। अगर मैं उस घर में न जाता तो शायद ऐसी सोच और ऐसा मेरा जीवन नहीं होता।   
      इस जीवन की पीड़ा, इस का कष्‍ट में तो वहां रह कर बिलकुल ही भूल गया था। सच कितना कठिन है ये जीवन। प्रकृति कितनी कठोर है। कितनी निर्दय सी दिखती है। यही है उसका काम करने का ढंग। कोई विरला साहसी ही उस से टक्‍कर ले सकता है। और जो उससे टकर न ले सके उसे जीने का कोई अधिकार नहीं है। यह हमारा विद्यालय है। मैं सोच रहा था कि मैं अगर वहां न जाता तो क्‍या जीवित रह सकता था। शायद नहीं। फिर ये कैसा न्‍याय आ अन्‍याय यह तो एक घटना है। कि आप किस हालत में कहां हो। परंतु ये सत्‍य है। इसे कौन जनता है। कोई नहीं। जीवन एक दुर्घटना है। इस पर हमारा कोई अधिकार नहीं है। मेरे और भाई बहन कहां जीवित रह सके। सच मेरी मां बहुत ही बहादूर है। इस प्रकृति से ही नहीं लड़ी अपितु लाख कष्‍ट उठा का उसकी उत्‍पती मे भी कितना सहयोग दे रही है। मुझे आज अपनी मां पर बहुत गर्व हो रहा था। मैंने फिर एक बार उसका मुहँ चाटा, उसकी आंखों में खुशी के आंसू थे। उसे लग रहा था उसका बेटा बहुत समझदार और महान बन गया है।
      हम पूरी रात एक दूसरे के साथ सोते रहे। आसमान पर लालिमा फैलने लगी थी। पक्षियों ने अपने मधुर नाद गाने शुरू कर दिये थे। दूर कहीं गीदड़ों की हुंकार सुनाई दे रही थी....उसे सुनकर मेरे तन बदल में आग लग गई। हालांकि मैं नहीं जानता था कि ये हमला मेरी मां पर उन्‍हीं लोगों ने किया है। मेरी मां उठ नहीं पा रही थी। शायद मां कई दिन से घायल पड़ी है। मुझे लगा काश मां मेरे साथ उठकर चल देती तो घर में मम्‍मी-पापा से कह कर इन्‍हें कितनी मजेदार चीजें खाने को दिलवाता, कोका कोला, आइसक्रीम, पिंजा, न्‍यूडल, बर्फ़ी, कचोरी, छोले चावल और न जाने कितनी बढ़ियां-बढ़ियां पकवान। मैं फिर उसे उठने के लिए मजबूर किया। परंतु वह लाख चाह कर भी उठ नहीं पा रही थी। मुझे याद है जब में बीमार हुआ था तो पापा जी किस तरह मुझे अपनी गोद में लेकर भागे थे। इस लिए मनुष्‍य श्रेष्‍ठ है वह कितने ही ऐसे काम कर लेता है जो दूसरे प्राणी सोच भी नहीं सकते करना तो दुर की बात हे। रात मेरे आने के समय मां कुछ उठ कर बैठी थी, मुझे चाटा था। परंतु अब वह हिल भी नहीं पा रही थी। उसका पूरा शरीर गर्म तप रहा था। उसका चेहरा जो रात को मुलायम था अब अकड़ कर टाईट हो गया था। ये सब देख कर मुझे डर लगा। कहीं.....मेरी मां मर......ओर मैं डर गया। नहीं ऐसा नहीं हो सकता। मैं अभी-अभी तो मां से मिला हूं....कितने दिनों बाद। अब हम साथ खेलेंगे एक दूसरे को प्‍यार करेंगे। नहीं मेरी मां जरूर ठीक हो जायेगी। श्‍याम होते तक पूरा दिन मां इसी तरह से लेटी रही। एक दम निढाल। मुझे भूख लगने लगी थी। और मैं चाह रहा था कि मां के लिए भी कुछ खाने के लिए लाऊं। परंतु यहां क्‍या मिल सकता है। घर जाकर वापस आना संभव नहीं था। तभी लगा की बहार निकल कर कम से कम पानी तो पिया जाये। पानी की तलाश में उस खाई से बहार निकला। लेकिन बहार तो काफी रोशनी था। नीचे खाई इतनी गहरी थी कि दिन में अँधेरा हो जाता था। मैं बहार निकल कर इधर उधर देखने कि कोशिश करने लगा। कि हम कहां पर है।
      क्‍योंकि कितनी ही बार मैं जंगल में आ चूका था। मैं समझने की कोशिश कर रहा था कि हम कहां है। क्‍योंकि जंगल का शायद कोई ऐसा हिस्‍सा नहीं था कि हम वहां न आये हो। मैं समझने की कोशिश कर रहा था कि दीदी और मम्‍मी कहां पर आकर कपड़े धोती थी। आज पहली बार में अपने आप को तन्‍हा और निस्सहाय महसूस कर रहा था। अपनी लाचारी पर आज मुझे खीज आ रही थी। सच जीवन में जो भी मिला था वह मनुष्‍य के संग साथ का दिया हुआ था। मेरा अपना उसमे कुछ भी अर्जित किया हुआ नहीं था। आज मुझे इस बात का सधन एहसास हो रहा था जिस बात पर मैं इतना अकड़ता था। वो आज मुझे आईना दिखी रही थी। सच आज मुझे पता चला कि मेरा अंहकार नाहक है। मैं आज भी ना कुछ ही हूं। फिर अपनी बेबसी और लाचारी से उभर कर मैं उस स्‍थान को खोजने की कोशिश करने लगा। चारों और मैंने अच्‍छी तरह से नजर दौड़ाई यहां से पूरा जंगल दिखाई नहीं दे रहा था। इस लिये में कुछ और उँची चट्टान पर चढ़ कर खड़ा हो गया। और पूरे जंगल को समझने की कोशिश करने लगा। चारों ओर घने पेड़ और झंडियां है। यहां से तो ऐसा महसूस हो रहा है। वहां पर तिल रखने की भी जगह नहीं है केवल पेड़ ही पेड़ है और झाड़ीया है। इनके बीच से कोई कैसे जा सकता है। परंतु असल में ऐसा नहीं है। दूर झाड़ियों के पार घास का मैदान दिखाई दिया उसके दाई और एक हरियाली की कतार जा रही थी। मैंने उसे गोर से देखने की कोशिश कि। और सच यही वह दो बड़े सहमल के वृक्ष है। जहां मम्‍मी और दीदी कपड़े धोती थी। और मैं वहां पर किसी आनंद और उत्‍सव के साथ मस्ती करता था। और शायद उस तरफ जो खाली जगह दिखाई दे रही है वहां पर पापा जी और बच्‍चे क्रिकेट खेला करते थे। अब इस बात को पता चल गया कि मुझे कहां जाना है परंतु इस जगह से जंगल में जाना और फिर इसी जगह आना अति कठिन था। अब इस बात का भी कोई तोड़ होना चाहिए। वरना अगर यहां से चला गया तो फिर शायद दोबार अपनी मरती मां के पास न आ सकूँ। क्‍योंकि यहां तो में कितनी ही बार आया था। परंतु इस गहरी खाई को चिन्‍हित नहीं कर सकता। सो एक आइडिया मेरे दिमाग में आया क्‍यों ने दिशा निर्देश करता हुआ चलू सब से पहले तो अपना चिर परिचित अंदाज इस खान से ही करता हूं। सो मैंने अपनी टांग उठाई और अपना होल मार्क वहां पर लगा दिया। और धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा। जब कहीं अधिक झाड़ी या रास्‍ता विकट हो जाता तो मैं चंद बुंदे अपने होल मार्क की टाँग उठा कर लगा देता। यही सबसे आसान और कारगर तरिका था। वापस आने का।
      हमार सिस्‍टम भी कितना अजीब है, शरीर को प्‍यास लगी है। और फिर भी शरीर पानी छोड़ता चला जाता है। शायद यह पीढ़ियों के अभ्‍यास का ही नतीजा है। और मैं जानता था कितनी बूँदे डालनी है। ऐसा नहीं की एक जगह ही अपना सारा बाथरुम खत्‍म कर दूं। रास्‍ते को भी अच्‍छी तरह से देखता हुआ मैं आगे बढ़ा। मेरा लक्ष्य वह सहमल के वृक्ष थे। जैसे-जैसे वह नजदीक आता जा रहा था। मेरा गला सूखता जा रहा था। कितने घंटे से मैने पानी नहीं पिया था। भूख तो लगी थी परंतु खाने के बिना काम चल सकता है। परंतु पानी के बिना अंदर एक खास तरह की कमजोरी महसूस होती है। तब शायद दौड़ना और चलना भी कठिन है। अचानक मेरे दिमाग में आया हो सकता है कि मेरी मां भी इस लिए नहीं उठ पा रही हो कि वह पानी नहीं पी सकी है। मेरे सूखे प्रेम में एक आशा की लहर उठी। और मैं तेज कदमों से उस और चल दिया। नाला ज्‍यादा दूर नहीं था। और इस नाले में हमेशा पानी बहता रहता है। और इस की दूसरी खासियत यह थी कि यह नाला किसी एक स्‍थान पर नहीं रुकता पूरे जंगल को चीरता -सिंचता शहर में चला जाता है।
      नाले के पास जाकर मैं एक पतली पगडंडी से नीचे की और उतरा। वहां गाय, गीदड़ आदि जानवरों के पैरो के निशान उस नरम मुलायम रेत पर छपे थे। उसमें एक कोने में मेरे जैसे भी कुछ पैरो के निशान थे। मैने उन्‍हें सूंघा उस में मेरी मां जैसी ही गंध थी और वह शायद एक या दो दिन पुराने थे। परंतु मां की हालत देख कर लगता था वह कई दिन से उठी नहीं है। फिर ये निशान किस के हो सकते है। मुझे लगा और भी जंगली कुत्‍ते जंगल में होंगे क्‍या मेरे भाई बहनो ने मां को घायल कर दिया। मेरा सर चक्रा गया। परंतु मैं ये क्‍यों सोच पा रहा था कि मैं एक परिवार में और मनुष्‍य के संग रहता था। वहां समाज की नैतिकता, परिवार का प्रेम बिखरा पडा था। और यहां इन लोगों की परवरिश केवल पेट भरने के लिए ही हाथी है। परंतु ऐसा नहीं कि हम अपने परिवार को भूल जाते है। सालों बाद भी क्‍या मेरी मां ने मुझे पहचान नहीं लिया था। मुझे इन सब से घिन्न आ रहा थी....मरे मन में एक विस्तीर्णता सी उठी। हम अपने स्‍वार्थ के लिए कितने गिर जाते है। धिक्‍कार है ऐसे जीवन से....जो अपने ही खून का प्‍यास हो....ओर सच मुझे अच्‍छा नहीं लग रहा था। यही सब सोचते हुए में कितनी ही देर वहां पर खड़ा रहा। तभी मुझे पानी की याद आई ओर मैं पानी के अंदर जाकर खड़ा हो गया। पानी सीतल और निर्मल था। किस मंथर गति से शांत बह रहा था। मैं उसमे कुछ देर के लिए बैठ गया। और अपना सिर उस में डुबो दिया। सर जो क्रोध और प्रतिहिंसा से जल रहा था....मैं उसे ठंडा कर लेना चाहता था। मैंने अपना पूरा सर पानी में डुबो कर आंखें खोली आज मुझे पानी से डर नहीं लग रहा था। अंदर मटमैला पानी और उस में चमकती सूर्य की किरणें कितनी भली लग रही थी। ऐसा मैंने आज पहली बार किया है। वैसे पहले भी पानी में नहाया हूं तेरा हूं, गुप्‍ची लगाई है, परंतु ऐसा करते मैंने पापा जी को देखा था परंतु मुझे डर लगता था की पानी के अंदर मैं सांस कैसे लूंगा। परंतु आज इस बात की जरा भी परवाह नहीं थी। मरने का भय मेरे मन मस्‍तिष्‍क से निकल गया था।  फिर धीरे-धीरे पानी को मुहँ से काट-काट कर पीने लेगा।
      कितनी देर में इसी तरह आंखें बंद किये पानी में रहने का आनंद लेता रहा। कैसा शरीर निर्भार हो जाता है पानी। इस से मेरे जलते मन और मस्‍तिष्‍क को कुछ राहत मिली। फिर अचानक मुझे मां की याद आई। की प्‍यास तो उसे भी लगी होगी। पानी तो उसे भी चाहिए। परंतु मैं पानी कैसे लेकर जाऊं। यह हालत तो मेरी घर पर भी होती थी। या तो कोई मेरे बर्तन में पानी डाल देता था वरना मुझे मांगना होता था। परंतु वहां तो अपना कटोरा मुख में उठा कर खाने या पानी के लिए ले जाता था। ये सब मैंने खेल-खेल में ही सीख लिया था। पहले इस बात पर सब लोग कैसे ताली बजाते थे। और मुझे शाबाशी देते थे। और मैं उस ताली के करतल नाद में गर्व से अपना खाने का कटोरा ले कर रसोई घर में चला जाता था। मुझे ये था कि जब मैं कटोरा लेकिर जाता तभी मुझे खाना मिल जाता। ये सब एक साथ घटा इस लिए इसे सीखने में मेरा अपना फायदा ही अधिक था इस लिए शायद मैंने सिख लिया। परंतु अगर वर्तन खाली हो तो मैं पानी मांगने के लिए किसी ने किसी सदस्‍य को पंजे मार कि कहने की कोशिश करता। परंतु यह तो हालत और भी खराब है। न यहां कोई बर्तन है। जिसे मैं मुंह में पकड़ कर ले जाऊं। हम पशु कितने लाचार और असहाय है। मैं अचानक पानी से बहार निकला और इधर-उधर कुछ तलाश करने लगा। क्‍या कुछ मिल जाये जिसे में मुंह से पकड़ कर अपनी मां के पास ले जाऊं। सोचा पानी को मुहं में भर कर ले चलता हूं वहां मां के पास जाकर खोल लूंगा। परंतु पानी मुंह में भर कर जैसे ही चला सांस लेना मुश्‍किल हो गया। मुंह बद कर के चलने की आदत हमारी जाती को नहीं है। फिर भी में ढूँढता रहा। परंतु  वहां पर कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। अब समझ में नहीं आ रहा था कि क्‍या करूं और क्‍या न करू। काफी दे ढूंढने के बाद मुझ एक झाड़ी में एक कपड़े का टुकड़ा नजर आया। मैंने उसके पास जाकर उसे सूंघा। वह किसी मनुष्‍य का था। तेज गंध आ रही थी। शायद ज्‍यादा पुराना नहीं था। फिर मैंने उसे मुंह से पकड़ कर गोल-गोल करने की कोशिश की और पानी की और चल दिया। अब में दोबारा पानी में घूस गया। और उस कपड़े समेत अपना मुख पानी में डुबो दिया। धीरे-धीरे कपड़े ने पानी पी लिया।  एक बार और इसी तरह से किया कपड़ा अंदर तक गिला हो गया। मेरे मुहं में उस कपड़े के गिले पन का पानी फैलने लगा। इसी तरह दो तीन बार और किया। फिर जोर से मैंने कपड़े को मुख से दबाया उसका सारा पानी निकल गया । और उसे फिर पानी में डुबोकर बहार की और निकल पडा तेज नहीं दौड़ सकता था। क्‍योंकि फिर मुझे मुख से स्‍वास लेनी होती  परंतु इतना धीरे भी नहीं चल रहा था कि कपड़े का सारा पानी टपक जाये। आने में जितना समय लगा था जाने में उतना समय नहीं लगा। क्‍योंकि जो रास्‍ता हम एक बार तय कर चूके होते है उसे दोबार चलना आसान हो जाता है।
      जब मेंने खाई को समने देख तब मेरी सांस में सांस आई। कि मैं सही जगह पर पहूंच गया हूं। वरना तो भटकने का डर तो था। क्‍योंकि कपड़ा मुख में होने के कारण में अपने लगाये चिन्‍हों को सूंघ नहीं सकता था। परंतु भगवान का लाख शुक्र है मैं सही सलामत उस खान के सामने आ गया। फिर जल्‍दी से नीचे उतरा मेरी मां आँख बंद किये लेटी थी। इस बार मेरे पैरों की आहट पाकर भी उसने उठने की कोशिश‍ नहीं की थी। मुझे देख कर डर लगा कि कही मेरी मां मर तो नहीं गई है। मैं इतनी दूर से अपनी मरती मां के लिए पानी लेने गया और उसे अंतिम समय पर पानी भी नसीब नहीं हुआ। परंतु ये देख कर मुझे खुशी हुई कि मेरी मां की साँसे चल रही है। परंतु वह अर्ध अचेतन अवस्‍था में थी। मैंने पास जाकर वह कपड़ा मां में मुख के पास रख दिया। उसके गिले पन के और सीतलता से मेरी मां ने आंखें खोली। और मुझे देख कर सोचने की कोशिश करने लगा। मैंने उसका मुहं चाटा। तब उसे शायद मेरे होने का भास हुआ। क्‍या हम मरते समय एक नींद की अवस्‍था में चले जाते है। और उस समय हमारा चेतन मन सुप्‍त अवस्‍था में चला जाता है। जिससे हम अपने परिचितों को पहचान नहीं सकते। मैंने वह कपड़ा अपनी मां के  मुख के पास कर दिया। उसने अपने अकड़े मुख को खोला और एक दम सफेद पड़ी जीब को बाहर निकाला। और धीरे-धीरे पानी को चाटनें की कोशिश करने लगा। और मैं देख रहा था उसकी बुझती आंखों में एक खास दुलार एक प्‍यार की चमक थी। शायद मेरे इस तरह के काम को देख कर उसे गर्व हो रहा होगा की मेरा यह पुत्र मनुष्‍य के संग जाकर कितना समझदार और भावुक हो गया है।
      मां की हालत पल-पल और अधिक बदतर होती जा रही थी। आंखें जो श्‍याम को बहार थी अब एक गहरे गड़े में समाई सी लग रही थी। मुख का जबड़ा एक दम सूख का पत्‍थर हो गया था। मुझे तो यह देख कर ही अचरज हो रहा था कि इतना सूखे और अकड़े हुए मुख को मां ने खोला कैसे। परंतु पानी की सीतलता ने मां को और शांत कर दिया। मैं उसे बार-बार चाट रहा था। वह बहुत मुश्किल से आंखे खोल पा रही थी। मैं उसके सामने बैठ गया और मां के शरीर पर जो घट रहा था उसे गोर से देखने लगा। मां की स्‍वास धीरे-धीरे मंद हो रही थी। और अचानक एक तेज हरकत शरीर ने की। जो अभी तक निर्जीव सा पडा सा पूरा का पूरा ऐंठ गया। और एक जोर का झटके के साथ मुख खुला और शांत ही रह गया। शायद मेरी मां के शरीर से प्राण निकल गये। किस सहज आसानी से मां ने मृत्‍यु का समना किया। वह मेरे मन में घर कर गई। मृत्‍यु को प्रेम और स्नेह से मां ने ग्रहण किया। वह कितना सरल था। चारों और मोत ने एक गाढ़ा वातावरण पैदा कर दिया। एक भारी पन जो तन और मन दोनों पर छाया हुआ था।  उधर श्‍याम ढल रही थी। और इधर मेरा मन डूब रहा था। किसी गहरी पिपाशा में। पक्षियों ने सोने से पहले जो कलरव शुरू किया आज उस में दर्द के स्‍वर थे। एक तड़प थी मां के खोने की जिस के करण में हिल भी नहीं पा रहा था। एक पत्‍थर के बुत की तरह में मेरे मां के शरीर को देखे जा रहा था। कैसे एक जीवित शरीर शांत हो जाता है। क्‍यों? कुछ तो होगा जो अपना पन लिए होगा। क्‍या हम शरीर को प्रेम करते है या उस के अंदर बसे किस अंजान जीवन से। शरीर तो वही है। अभी भी फिर भी मां से प्‍यार क्‍यों नहीं कर पा रहा हूं। परंतु कुछ क्षण पहले वह कैसे प्रेम पूर्ण लग रही थी। जरूर हम जिसे प्रेम करते है वह जीवन कुछ और ही है। शरीर तो मात्र एक माध्‍यम है। यह तो जरिया है। धीरे-धीरे प्रकृति सोने की तैयारी कर रही थी। परंतु मैं क्‍या कर सकता था। मेरी मरी मां का शरीर मेरे सामने पड़ा था। मैं उसे केवल देख सकता था।
      वह पूरी रात मैंने अपने मां के शरीर के साथ गुजारी। न ही मुझे भूख थी और न ही मुझे प्‍यास थी। सच कहूं उस समय तक मुझे मम्‍मी-पापा जी की याद नहीं थी। अगर मेरी मां जीवित होती तो मैं शायद कभी गांव में नहीं जाता। और अगर जाता तो मां को साथ लेकर जाता। जिस के लिए मां शायद ही तैयार होती। परंतु इन सब बातों के विषय में अब सोचने से क्‍या लाभ। अब तो सब खत्‍म हो गया। परंतु मुझे मां के संग साथ जो मिला है उसमें कुछ नया पन मेरे जीवन में भर गया। अभी में यहां उसे सजो लेना चाहता हूं। अभी घर जाने का मेरा जरा भी मन नहीं था। और न ही मुझे अपनी मां के शव के पास बैठ कर डर लग रहा था। सच पूछो तो मैंने आज मृत्‍यु का जो रूप देखा है। उस से मेरे मन में उसके उसका भय समाप्‍त हो गया है। मृत्‍यु उतनी कुरूप या भयावह नहीं है जितना हम उसके विषय में सोचते है। या उस से डरते है। वह तो एक गहरी शांति लेकिन आती है। मेरी मां के सारे दर्द से कैसे निजात दिला गई। बंधन ही पीड़ा है। जब हम उसे पकड़ना चाहते है तो हम भयभीत हो जाते है। मां ने उसे कैसे सहजता से अपने शरीर पर आने दिया। उसका प्रतिरोध जरा भी नहीं किया। वह उतनी ही सहज और सरल हो गई। पूरी रात यही सोचता रहा....रात गहरी हो गई थी। आस पास जंगली जनावरों की हरकत शुरू हो गई। निशाचर अपना पेट भरने के लिए निकल पड़े। मानों दिन में ये जंगल आराम करता है और रात के समय क्रियाशील हो जाता है। कब इस उधेड़ बुन में आँख लगी या नहीं लगी कह नहीं सकता। जब गीदड़ की हुंकार सुनाई दी तब मैंने आसमान की और देखा आसमान में लालिमा फैल रही थी। मैंने एक बार मां के शरीर को फिर देखा। वह तो एक दम पत्‍थर हो गया। क्‍या शरीर में प्राण के रहते ही उस में लोच होती है। वह अकड़ कर लाठी की तरह हो गया....एक बार फिर मैंने मां के मुहँ के पास मुंह ले जाकर चाटा....अब वहां कोई नहीं था। एक मिट्टी का ढेला मात्र था। मेरा मन भर आया। और मैं भारी कदमों से खान के बाहर की और चल दिया। बाहर निकल कर मैंने फिर मां के शरीर को अंतिम बार देखने की कोशिश की परंतु झाड़ीया बहुत घनी थी.....बस आंखों में मां की छवि और मन उसकी प्‍यारी स्‍मृति लिये में भारी कदमों से घर की और चल दिया....एक लूटे मुसाफिर की तरह। जिसे मिलने से पहले सब कुछ गंवा दिया हो।
क्रमश: अगले अंक में.......
स्‍वामी आनंद प्रसाद मनसा

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