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सेवन पोर्टलस आफ़ समाधि: (ओशो की प्रिय पुस्तनकें)-------------------

हवा का एक झोंका है ब्‍लावट्स्‍की। और कोई उससे बहुत महानतर शक्‍ति उस पर आविष्‍ट हो गई है: और वह हवा का झोंका उस सुगंध को ले आया है।)
      इस जगत में जो भी जाना लिया जाता है। वह कभी खोता नहीं है। ज्ञान के खोने का कोई उपाय नहीं है। न केवल शास्‍त्रों में संरक्षित हो जाता है ज्ञान, वरन और भी गुह्म तलों पर ज्ञान की सुरक्षा और संहिता निमित होती है। शास्‍त्र तो खो सकते है। और अगर सत्‍य शास्‍त्रों में ही हो तो शाश्‍वत नहीं हो सकता। शास्‍त्र तो स्‍वयं भी क्षणभंगुर है। इसलिए शास्‍त्र संहिताएं नही है। इस बात को ठीक से समझ लेना जरूरी है। तभी ब्‍लावट्स्‍की की यह सूत्र पुस्‍तिका समझ में आ सकती है।
      ऐसा बहुत पुराने समय में भारत ने भी माना था। हमने भी माना था कि वेद संहिताओं का नाम नहीं है। शास्‍त्रों का नाम नहीं है। वरन वेद उस ज्ञान का नाम है, जो अंतरिक्ष में , आकाश में संरक्षित हो जाता है। जो इस अस्‍तित्‍व के गहरे अंतस्‍तल में ही छिप जाता है। और होना भी ऐसा ही चाहिए। बुद्ध अगर बोले और वह केवल किताबों में लिखा जाए तो कितने दिन टिकेगा। और बुद्ध का बोला हुआ अगर अस्‍तित्‍व के प्राणों में ही न समा जाए तो अस्‍तित्‍व ने उसको स्‍वीकार ही नहीं किया।

      करोड़ों-करोड़ों वर्ष में कोई व्‍यक्‍ति बुद्धत्‍व को उपल्‍बध होता है। वह जो जानता है, वह इस जगत का जो गहनत्म अनुभव है। जो रहस्‍य है। इस जगत की जो आत्‍यंतिक अनुभूति है, यह पुरा जगत उसे सम्‍हाल कर रख लेता है। इस जगत के कण-कण की गहराई में वह अनुभूति छा जाती है। समाविष्‍ट हो जाती है। वहीं अर्थ है कि वेद शास्‍त्रों में वह अनुभूति छा जाती है। समाविष्‍ट हो जाती हे। यही अर्थ है कि वेद शास्‍त्रों में नहीं, वरन आकाश में लिखा जाता हे। शब्‍दों से नहीं बल्‍कि जब बुद्ध जैसे व्‍यक्‍ति के प्राणों में सत्‍य की घटना घटती है। तो साथ ही साथ उस घटना की अनुगूँज आकाश के कोने-कोने में छा जाती है। और जब भी कोई व्‍यक्‍ति बुद्धत्‍व के करीब पहुंचने लगेगा, तब प्राचीन बुद्धों ने जो जाना था, उसके प्राणों में आकाश के द्वारा, उस अनुगूँज की फिर से प्रतिध्‍वनि हो सकती हे।
      ब्‍लावट्स्‍की की यह किताब साधारण किताब नहीं है। इसने उसे लिखा नहीं, इसने उसे सुना ओर देखा है। यह उसकी कृति नहीं है, वरन आकाश में जो अनंत-अनंत बुद्धों की छाप छूट गई है, उसका प्रतिबिंब है। ब्‍लावट्स्‍की ने कहा है कि यह जो मैं कह रही हूं, यह आकाश-संहिता से मुझे उपलब्‍ध हुआ है। ऐसा मैंने आकाश से पाया और जाना है।
      आकाश से अर्थ है: वह जो चारो तरफ घेरे हुए है हमें, जो हमारे भीतर भी है और हमारे श्‍वास-श्‍वास में है। जिसके बिना हम नहीं हो सकते; और हम नहीं थे तब भी जो था। और हम नहीं होंगे तब भी जो रहेगा। आकाश से अर्थ है: परम अनस्तिव का। ब्‍लावट्स्‍की ने कहा है: इस परम अस्‍तित्‍व ने ही मुझे बताया है। वही इस पुस्‍तक में मैंने संग्रहीत किया है। लेखिका वह नहीं है। सिर्फ संग्रह किया है उसने।
      यही वेद ऋषियों ने कहा है कि हमने सुना है वह वाणी। और हमने अपने हाथों लिखी है। लेकिन हमारे हाथों से कोई और ही उसे लिखवाया हे। जीसस ने भी यही कहा है कि मैं जो कह रहा हूं; वाणी मेरी हो, लेकिन जो उस वाणी से बोल रहा है। वह परमात्‍मा का है। मोहम्‍मद ने भी यही कहा हे कि कुरान मैने सुनी है। उसका इलहाम हुआ। उसकी मुझे प्रेरण हुई है; और किसी रहस्‍यमयी शक्‍ति नें मुझे पुकार और कहा कि पढ़।    
      और मोहम्‍मद के साथ तो बड़ी मीठी घटना है। क्‍योंकि मोहम्‍मद पढ़ नहीं सकते थे। और जब पहली बार उन्‍हें ऐसी भीतर कोई आवाज गूंज गई कि पढ़, तो मोहम्‍मद ने कहा; मैं हूं बे पढ़ा लिखा। मैं पढूंगा कैसे। और कोई किताब तो सामने थी ही नहीं। जिसे पढ़ना था। कुछ और था आंखों के सामने जिसे गैर पढ़ा लिखा भी पढ़ सकता है। जिसको कबीर भी पढ़ लेते है। कुछ और था जो पढ़ना नहीं पड़ता। जो दिखाई पड़ता है। कुछ और था। जो इन आंखों से जिसका कोई संबंध नहीं है। किसी और भीतर की आँख का संबंध है। मोहम्‍मद ने समझा कि इन आंखों से मैं कैसे पढूंगा। मैं पढ़ा लिखा नहीं हूं। लेकिन कोई और भीतर की आँख पढ़ सकती है। और वही कुरान का जन्‍म हुआ।
      ब्‍लावट्स्‍की की यह पुस्‍तक, समाधि के सप्‍त द्वार वेद, बाईबिल, कुरान महावीर बुद्ध के वचन, उस हैसियत की पुस्‍तक है। यह भी उसे आकाश में अनुभव हुआ है।
      इस पुस्‍तक के एक-एक सूत्र को समझ पूर्वक अगर प्रयोग किया तो जीवन से वासना ऐसे ही झड़ जाती है, जैसे कोई धूल से भरा हुआ आए और स्‍नान कर ले और सारी धूल झड़ जाए। या कोई थका मांदा किसी वृक्ष की छाया के नीचे विश्राम कर ले और सारी थकान विसर्जित हो जाए। ऐसा ही कुछ इस पुस्‍तक की छाया में, इस पुस्‍तक के स्‍नान में आपके साथ हो सकता है। लेकिन इसे बुद्धि से समझने की कोशिश मत करना। इसे ह्रदय से समझने की कोशिश करें।
मैंने इस पुस्‍तक को जान कर चूना है। क्‍योंकि इधर दो सौ वर्षों में ऐसी न के बराबर पुस्‍तकें  है, जिनकी हैसियत वेद-कुरान और बाइबिल की हो। उन थोड़ी सी दो चार पुस्‍तकों में है यह पुस्‍तक।
      समाधि के सप्‍त द्वार। और इसलिए भी चुना कि ब्लावट्स्की ने जरा सी भी भूलचूक नहीं की आकाश की संहिता को पढ़ने में। ठीक मनुष्‍य के जगत में उस दूर के सत्‍य को जितनी सही-सही हालत में पकड़ा ह। प्रतिबिंब जितना साफ बन सकता है। उतना प्रतिबिंब साफ बना है। और यह पुस्‍तक आपके लिए जीवन की आमूल क्रांति सिद्ध हो सकती है। फिर इस पुस्‍तक का किसी धर्म से भी कोई संबंध नहीं है। इसलिए भी मैंने इसे चुना है। न यह हिंदू है,न यह मुसलमान हे। और धर्म को जितना निर्वैयक्‍तिक, गैर-सांप्रदायिक ढंग से प्रकट किया जो सकता है। उस ढंग से इसमे प्रकट हुआ है।
ओशो
समाधि के सप्‍त द्वारा

लीव्‍स ऑफ ग्रास: वॉल्‍ट विटमैन

जुलाई 1855, वॉल्‍ट विटमैन छत्‍तीस साल का रहा होगा। जब उसकी लीव्‍स ऑफ ग्रासका प्रथम संस्‍करण छपा। यदि वह तारीख चार जुलाई अमेरिका का स्‍वतंत्रता दिवसनहीं रही होगी तो होनी चाहिए। उस दिन विटमैन ने न केवल पत्रकारिता के अपने अभूतपूर्व व्‍यवसाय से, स्‍वच्‍छंद लिखने से और तुकबंदी से बल्‍कि साहित्‍य की उन परंपराओं से जो साहित्‍य को लोकतंत्र के कालवाह्मा बनाती है। स्‍वतंत्र होने की घोषणा की। विटमैन ने ऐसी कविता लिख जिसके व्‍यापक आकार और कल्‍पना में उन अमरीकी लोगों के जीवन की और व्‍यवसाय की झलक थी जिनके पास कविता पढ़ने की फुरसत नहीं थी।


      अपने स्‍वयं के निजी स्‍वभाव का उत्‍सव मनाकरवॉल्‍ट विटमैन ने अमरीका स्‍वभाव का उत्‍सव मनाया। उसकी किताब के छह संस्‍करण प्रकाशित हुए। अगले पैंतीस वर्षों में उसके और कई संस्‍करण छपे। जब कि बराबर उसकी निषेधात्‍मक आलोचनाएं,कविताओं के सेन्‍सर करने के प्रयेत्‍न हो रहे थे। वॉल्‍टन में 1882 में उसे प्रतिबंधित भी किया गया।
      इस किताब की पहली प्रति पढ़ने के बाद इमर्सन ने, साहित्‍य में किये गये विटमैन के ढीठ प्रयोग को बुद्धि ओर प्रज्ञा की असाधारण कलाकृति जो अमेरिका ने आज तक पैदा की है। इन शब्‍दों में नवाजा।
      विटमैन के आलोचकों को क्‍या तकलीफ थीउसके कविता की परिपाटी को तोड़-मरोड़ दिया था। न तो उसने सर्वमान्‍य छंद और मात्राओं की फिक्र की, न अनुप्रास का मेल किया। उसने चालू अमरीकी जबान में अपने आपको मुक्‍त भास से प्रगट किया। उसके लिए सेक्‍स जीवन का एक महत्‍वपूर्ण अनुभव है। जिसका उत्‍सव उसने अनेक कविताओं में मनाया था। उसी वजह विक्‍टोरियन अमेरिका की नैतिकता से उसे बहुत तिरस्‍कार मिला।
      आज विटमैन को अमेरिका का होमर और डांते कहा जाता है। और उसके कृतित्‍व को नये युग में साहित्‍यिक मौलिकता की कसौटी। विटमैन अपने साहित्‍य को सिर्फ साहित्‍यिक प्रयोग नहीं मानता था। वे उसके अपने भावनात्‍मक और व्‍यक्‍तिगत स्‍वभाव की अभिव्‍यक्‍तियां थी। इस अर्थ में लीव्‍स ऑफ ग्रासआत्‍म कथा है। लेकिन कवि की दृष्‍टि पूरे अमेरिका जीवन की जोशीली आत्‍मा को घेर लेती है।
      लीव्‍स ऑफ ग्रास के प्रकाशन के तीस साल बाद, सा 1880 में मरण शय्या पर पड़े विटमैन ने किताब की अंतिम भूमिका लिखते हुए कहा: तीस साल के अनवरत संघर्ष के बाद अब मैं बुढ़ापे की धुँधली रोशनी में, लीव्‍स ऑफ ग्रास को देखता हूं, वह नये जगत के लिए दीप स्‍तंभ है—अगर मैं ऐसा कह सकूँ तो। मुझे अपने समय ने स्‍वीकार नहीं किया और मैं भविष्‍य के सुहाने सपनों के सहारे जीता हूं। सांसारिक और व्‍यावसायिक अर्थों में लीव्‍स ऑफ ग्रास, असफल से भी बदतर रही। लोगों ने मेरी किताब की और उसके लेखक के नाते मेरी जो आलोचना कि, उसमें अभी तिरस्‍कार और क्रोध का स्‍वर है। मेरे दुश्‍मनों की एक मजबूत कतार हर कहीं मौजूद होती है......।
      लेकिन मुझे जो कहना था उसे मैंने पूर्णत: मेरे ढंग से कहा और उसे अचूक दर्ज किया। उसका मूल्‍यांकन समय ही करेगा। इतना जरूर है कि मेरी आत्‍मा के बाहर की किसी भी ताकत से न मैं प्रभावित हुआ, न विकृत हुआ।‘’
      साहित्यिक, पाठक, आलोचक वॉल्‍ट विटमैन से इतने क्रोधित क्‍यों थे? उसने किसी का क्‍या नुकसान किया था? अपना गीत ही तो गाया था। लेकिन यही उसका कसूर था।

ओशो का नजरिया:
      मैं वॉल्‍ट विटमैन से उतना ही प्रेम करता हूं, जितना रवीन्द्र नाथ टैगोर से। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि रवीन्द्र नाथ भारतीय है और वॉल्‍ट विटमैन अमरीकी। दोनों में कुछ है जो इन  मूढता पूर्ण बातों का अतिक्रमण करता है। अमरीकी, हिंदू,भारतीय ईसाई। दोनों अज्ञात में ऊंची उड़ान भरते है। और जो अव्‍याख्‍येय है। उसे व्‍यक्‍त करने की अद्भुत क्षमता रखते है। वॉल्‍ट विटमैन मेरे प्रियजनों में से एक है।
दि लास्‍ट टेस्‍टामेंट

      आज सुबह मैंने वॉल्‍ट विटमैन के शब्‍द कहे। वह कहता हूं, मैं उत्‍सव हूं, मैं गीत हूं।‘’
      यह एक अति सुंदर कविताओं में से एक है। उसमें वह अपना ही गीत गाता है। कोई कारण नहीं है, उत्‍सव होना, गीत होना मेरा स्‍वभाव है। यह स्‍वस्‍थ है। इसका मतलब है, स्‍वयं होना।
      वॉल्‍ट विटमैन जब तक जिंदा रहा। उसकी बड़ी निंदा की जाती रही। क्‍योंकि वह अकारण प्रसन्‍न रहता था। वह अकेला नाच सकता था, गा सकता था। किसी के लिए नहीं बस, स्‍वयं के लिए। यह कि वह स्‍वयं एक गीत था। स्‍वयं मूर्तिमान उत्‍सव था। ईसाई गंभीरता उसे समझ न सकी। साधारण मनुष्‍य जाति या तो उसे पागल समझती थी या शराबी। लेकिन न वह नशे में था न पागल। अमेरिका ने जितने लोगों को पैदा किया है उनमें वह सबसे बुद्धिमान लोगों में से एक था। बुद्धिमानी एक उत्‍सव है।

दि इनविटेशन

मिस्‍टर एकहार्ट के रहस्‍य सूत्र—(ओशो की प्रिय पुस्तकें)

एक हार्ट बहुत करीब था। एक कदम और, और संसार का अंत आ जाता—उस पार का लोक खुल जात।
     एक हार्ट जर्मन का सबसे रहस्यपूर्ण और ग़लतफ़हमियों से घिरा रहस्‍यदर्शी है। एक सदी पहले तक जर्मन रोमांटिक आंदोलन के द्वारा मिस्‍टर एकहार्ट को, ‘’एक अर्ध रहस्‍यवादी चरित्र’’  समझा जाता था। न तो उसके जन्‍म की तारीख मालूम थी, न स्‍थान। जर्मनी में किसी कब्र पर उसका नाम दिवस खुदा नहीं था। कुछ छुटपुट तथ्‍यों की जानकारी थी—मसलन वह परेसा में पढ़ा, सन 1402 में डाक्‍टर ऑफ थियॉलॉजी की उपाधि प्राप्‍त की, जर्मनी के स्‍टैसवर्ग शहर में वह उपदेशक था। 1322 में कालोन के एक विद्यापीठ में उसे ससम्‍मान आमंत्रित किया गया। और पीठाधीश बनाया गया। तब तमक एकहार्ट अपने रहस्‍यवाद से ओतप्रोत प्रवचनों के लिए प्रसिद्ध हो चुका था। कालोन के आर्चबिशप को रहस्यवाद से चिढ़ थी। उसे उसमें बगावत की बू नजर आती थी। 1326 में उसने एकहार्ट पर मुकदमा दायर किया। उस पर इलजाम था, वह सामान्‍य जनों में खतरनाक सिद्धांत फैल रहा है।
एकहार्ट जैसे प्रतिष्‍ठित शिक्षक के खिलाफ लगाया गया यह आरोप अभूतपूर्व था। एकहार्ट ने जवाब दिया कि वह सिर्फ पेरिस विश्वविद्यालय या पोप को जवाब देगा। मुकदमा लंबे समय तक चला। न्यायाधीश बदलते रहे। आखिर स्‍वयं पोप ने धर्म शास्‍त्रियों की समिति नियुक्‍त की। हर नयी समिति एकहार्ट के प्रवचनों के कुछ अंश निकालकर उन्‍हें बगावती, गैर धार्मिक करार देती रही। हर आरोप का खंडन एकहार्ट खुद करता रहा। यह सिलसिला जारी ही था कि इस बीच एकहार्ट की मृत्‍यु हो गई। उसके मरने के एक साल बाद भी पोप ने उसके प्रवचनों के कुछ अंश अलग किए और उन्‍हें खतरनाक और बगावती करार किया।
      ईसाई चर्च की साजिश की वजह से सन् 1900 तक एकहार्ट के वचनों को अंधेरे में छुपाया गया। जब उसकी खोजबीन शुरू हुई तब एकहार्ट के लेखन की भाषा पुरानी हो चुकी थी। लेकिन उसके शब्‍दों से उठती हुई सत्‍य की, निजी अनुभव सुगंध आज भी उतनी ही ताजा थी। एक सदी पहले तक उसके कुछ ही प्रवचन उपलब्‍ध थे। अन्‍य सब लेखन गायब थे।

ओशो का नजरिया--
      आज मेरी सूची में दूसरा नाम है: एकहार्ट, काश वह पूरब में पैदा होता। जर्मन लोगों में पैदा होकर परम तत्‍व के बारे में बात करना थोड़ा मुश्‍किल काम है। लेकिन इस बेचारे ने यह काम किया, और बहुत अच्‍छे तरह  किया। जर्मन आखिर जर्मन है। वे कुछ भी करें, परिपूर्णता से करते है।
      एकहार्ट गैर पढ़ा लिखा था। आश्‍चर्य की बास है, रहस्यदर्शीयों में से कई लोग पढ़े लिखे नहीं थे। लगता है शिक्षा में कोई गलती है, शिक्षित रहस्यदर्शीयों की संख्‍या इतनी कम क्‍यों है? निश्‍चित ही,  शिक्षा कुछ नष्‍ट कर रही है। इसलिए लोग रहस्‍यदर्शी नहीं हो पा रहे। हां,  शिक्षा पच्‍चीस साल बरबाद कर देती है—किंडरगार्टन से लेकिर विश्‍वविद्यालय  के पोस्‍ट ग्रैजुएट तक तुम्‍हारे भीतर जो भी सुंदर है, उसे नष्‍ट करती चली जाती है। विद्वता के नीचे कमल का फूल कुचल दिया जाता है। तथाकथित प्राध्‍यापक, शिक्षक, उप कुलपति आदमी के भीतर के गुलाब को मसल देते है। उन्‍होंने खुद के लिए कैसे-कैसे खुबसूरत नाम चुने है।
      वास्‍तविक शिक्षा अभी शुरू नहीं हुई है। शुरू होनी है। वह ह्रदय की शिक्षा होगी। दिमाग की नहीं—तुम्‍हारे भीतर जो स्‍त्रैण तत्‍व है उसकी, पुरूष तत्‍व की नहीं।
      हैरानी की बात है कि एकहार्ट जर्मनी के बीच पैदा होकर—जो कि सर्वाधिक दंभ से भरी जाति है। अपने ह्रदय में बना रहा। और वही से बोलता रहा.....।
      एकहार्ट ने थोड़ी सी बात कहीं, लेकिन वह उस समय के कुरूप धर्म गुरूओं को झूंझलाने के लिए काफी थी। पोप, और अन्‍य सारे शैतान जो धर्मोंपदेशकों के इर्दगिर्द होते है उन्‍होंने एकहार्ट पर पाबंदी लगा दी। वे एकहार्ट को सिखाने लगे कि क्‍या कहना है। और क्‍या नहीं कहना है। लेकिन इकहार्ट सरल आदमी था उसने अधिकारियों की बात मान ली। वह तो मेरे जैसा पागल आदमी होता है जो इन मूर्खों की बात नहीं मानता।
      ....इकहार्ट बहुत करीब था। एक कदम और, और संसार का अंत आ जाता। उस पार का लोक खुल जाता। लेकिन पोप के सारे दबाव के बावजूद उसने खूबसूरत बातें कही। उसके वक्‍तव्‍यों में सत्‍य का अंश प्रवेश कर गया। इसलिए मैं (मेरे मनपसंद लेखकों में) उसे शामिल करता हूं।
ओशो
बुक्‍स आई हेव लव्‍ड

एनेलेक्‍टस ऑफ कन्फ्यूशियस—ओशो की प्रिय पुस्तकें

कन्फूशियस चीन के प्राचीन और प्रसिद्ध दार्शनिकों में से एक है। जैसा कि सभी प्राचीन पौर्वात्‍य व्‍यक्‍तियों के साथ हुआ है, इतिहास में उसके जन्‍म और मृत्‍यु की कोई सुनिश्‍चत तारीख दर्ज नहीं है। जो भी उपलब्‍ध है वह केवल अनुमान है। कन्‍फ्यूशियस का जीवन काल ईसा पूर्व 551-479 बताया जाता है। कुछ इतिहासविद् उससे सहमत है, कुछ नहीं। जो भी हो, उसके जैसे व्‍यक्‍तियों के वचन महत्‍वपूर्ण होते है, उनका इतिहास या भूगोल नहीं। उसके जीवन के संबंध में जो भी आंशिक जानकारी इधर-उधर उपलब्‍ध है उसे जोड़कर जो चित्र बनता है वह यह कि कन्‍फ्यूशियस सामान्‍य परिवार में पैदा हुआ, वह विवाहित था। जीते जी उसकी ख्‍याति एक विद्वान और सर्वज्ञ ऋषि के रूप में फैल चुकी थी। और वह लगातार उसका खंडन करता था। वह इसका इन्‍कार करता था कि वह उसके पास कोई विशेष ज्ञान है। उसके मुताबिक उसके पास जो असाधारण बात थी वह थी सत्तत सीखने की प्‍यास। सुदूर अतीत में जो दिव्‍य शास्‍ता थे उनके आगे वह स्‍वयं को नाकुछ मानता था।

      उसका काम सिर्फ इतना था कि प्राचीनतों के ज्ञान को वह हस्‍तांतरित करे। पुरातन में उसका विश्‍वास और निर्भरता अटूट थी।
      परंपरा के अनुसार कन्‍फ्यूशियस के 72 शिष्‍य थे और एनेलेक्टस में बीस शिष्‍यों के सूत्र है। एनेलेक्‍टस चीनी शब्‍द ‘’लून यू’’ का अनुवाद है। उसका अर्थ है। चुनिंदा वचन। इस किताब के बीस परिच्‍छेद है और इसकी सामग्री से पता चलता है कि ये कन्‍फ्यूशियस की मृत्‍यु के अरसे बाद लिखे गये है। कन्‍फ्यूशियस के शिष्‍यों की कई शाखाएं बन गई थी। उसके पट्टी शिष्य मास्‍टर त्‍सेंग की मृत्‍यु हो चुकी थी। इन बीस परिच्‍छेदों में से सिर्फ तीन से नौ तक परिच्‍छेद पुराने और कन्‍फ्यूशियस के मूल रूपेण मालूम होते है। 10 और 20 परिच्‍छेद का मूल सूत्रों से कोई संबंध नहीं है। दसवां परिच्‍छेद क्रिया कांडो के नियमों का संकलन है और बीसवें में शु चिंग  प्रणाली के वचन है। उन्‍नीसवें परिच्‍छेद में सिर्फ शिष्‍यों के वचन है। 18, 17 और 14 के परिच्‍छेदों में तो कन्‍फ्यूशियस के विरोधकों के वचन संग्रहीत है।
      मूल किताब का सर्वसंमत समय है ईसा पूर्व चौथी शताब्दी। लेकिन इस किताब में अलग-अलग लोगों के वचनों की जो खिचड़ी पकाई गई है उसे देखते हुए लगता है कि क्‍या कन्‍फ्यूशियस के कुछ असली सूत्र हमारे हाथ लगेंगे। इस संबंध में चीनी मुहावरों का चलन समझ लें तो हम रिलैक्‍स हो जायेंगे। चीन सदा से प्राचीन प्रज्ञा को मानता रहा है। और इसीलिए जो भी सूत्र वहां प्रचलित है वे प्राचीन समय में चले आ रहे है। कोई भी एक व्‍यक्‍ति  उनका लेखक नहीं है। कन्‍फ्यूशियस भी खुद को एक माध्‍यम मानता है, द्रष्‍टा नहीं।
      अब हम उन परिच्‍छेदों को देखें जो यकीनन कन्‍फ्यूशियस के माने जाते है। वे है तीन से लेकर नौ तक। इनकी आबोहवा, सोच, अभिव्‍यक्‍ति कन्‍फ्यूशियस दर्शन से मेल खाती है। उनके विषय है—क्रिया कांड, भलाई, शिष्‍यों का मूल्यांकन, कन्‍फ्यूशियस का स्‍वयं के संबंध में वक्तव्य और कुछ शिष्‍यों की कहानियां। कन्‍फ्यूशियस के वचन ‘’दि मास्‍टर सैड’’ इन शब्‍दों से शुरू होते है। अन्‍य शिष्‍यों को भी मास्‍टर कहा गया है। लेकिन आगे उनका नाम भी आता है।
किताब की एक झलक:
      मास्‍टर ने कहा: उच्च पद पर संकीर्ण दृष्‍टि के लोग, कोई भी धार्मिक क्रिया बिना आदर के साथ बिना दुःख के निभाई गई मृत्‍यु शोक की रस्‍में--इन्‍हें देख सकता ।
      मास्‍टर ने कहा: भलाई के बगैर आदमी लंबे समय तक विपदा नहीं झेल सकता। और न ही लंबे समय तक संपदा को भोग सकता है।
      मास्‍टर ने कहा: धन और पद हर व्‍यक्‍ति को चाहत होती है। लेकिन यदि वे उसके मार्ग में अवरोध बनते है तो उन्‍हें छोड़ देना चाहिए। गरीबी और अपनी पहचान नहीं होना, इससे हर कोई नफरत करता है। लेकिन यदि वे उसके मार्ग में बाधा नहीं बनते है तो उनका वरण करना चाहिए। जो सज्‍जन भलाई का दामन छोड़ते हों वे सज्‍जन कहलाने योग्‍य नहीं है। सज्‍जन भलाई की राह से कभी भटकते नहीं है। वे कभी इतने परेशान नहीं होते कि इसके आगे घुटने टेक दें। या कभी इतने बेहाल नहीं होते कि इसके आगे झक जाएं।
      मास्‍टर ने कहा: सुबह को मार्ग के संबंध में सुनो, सांझ संतुष्‍ट मर जाओ।
      मास्‍टर ने कहा: मेरे मार्ग पर एक ही धागा है जो उसके भीतर से बहता है।
      मास्‍टर चेंग ने कहा, ‘’हां’’
      जब मास्‍टर बाहर चले गये तब शिष्‍यों ने पूछा इसका क्‍या मतलब हुआ। मास्‍टर चेंग     ने कहा, ‘’हमारे मास्‍टर का मार्ग है: वफादारी है, सोच।‘’
      मास्‍टर ने कहा: भले आदमी की मौजूदगी में सतत सोचो कि तुम उसके जैसे कैसे हो सको। बुरे आदमी की मौजूदगी में अपनी आंखें भीतर मोड़ लो।
      मास्‍टर ने कहा: पुराने जमाने में व्‍यक्‍ति अपने शब्‍दों पर नियंत्रण रखता था क्‍योंकि उसे यह डर होता था कि अगर वह शब्‍दों को आचरण में न उतार सके तो उसकी कितनी बेइज्‍जती होगी।
      मास्‍टर ने कहा: सज्‍जन यह ख्‍याति चाहता है कि वह बोलने में धीमा है लेकिन काम करने में तेज है।
      मास्‍टर ने कहा: जान युंग भला है लेकिन बोलने में कमजोर है।‘’
      मास्‍टर ने कहा: उसे अच्‍छा वक्‍ता होने  की जरूरत क्‍या है?
            जो होशियारी के साथ दूसरों को नीचा दिखाते है वे कभी लोकप्रिय नहीं होते। वह भला है या नहीं। यह मैं नहीं जानता लेकिन उसे कुशल वक्‍ता बनने की कोई जरूरत नहीं है।‘’
      मास्‍टर ने कहा:  साइ यू दिन में सोता था। सड़ी हुई लकड़ी का शिल्‍प नहीं बन सकता। और न ही सूखे गोबर के कंडों से बनी दीवाल पर पलास्टर लग सकता है। में उसे डांट भी दूँ तो क्‍या फायदा।
      मास्‍टर ने कहा: एक समय था जग मैं लोगों की बातें बड़े गौर से सुनता था और मान लेता था कि वे उनके शब्‍दों पर अमल करेंगे। और अब ने केवल उनकी बातों को सुनता हूं वरन वे जो कहते है उस पर भी नजर रखता हूं। त्‍साई यु के साथ मेरा जो तजुर्बा था उसे यह बदलाहट आई है।
      मास्‍टर ने कहा: मुझे जो सिखाया गया था, उसे मैंने यथावत हस्‍तांतरित किया, उसमें अपनी और सक कुछ भी जोड़ा नहीं। मैं प्राचीनों के प्रति निष्‍ठावान था और उनसे प्रेम करता था। मैं मौन होकर सुनता रहा और जो कहा गया उसे आत्‍मसात करता गया। मैं सीखने से कभी थका नहीं और जो सीखा उसे दूसरों को सिखाने से भी निश्‍चय ही ये गुण है जिनका मैं दावा कर सकता हूं। ये ख्‍यालात मुझे उद्विग्‍न करते है कि मैंने अपनी नैतिक शक्‍ति की और ध्‍यान नहीं दिया, मेरी शिक्षा को पूरा नहीं किया, कि मैंने ईमानदार लोगों के बारे में सुना लेकिन मैं उनके पास नहीं गया, मैंने दुर्जनों के बारे में सुना लेकिन मैं उन्‍हें सुधार नहीं सका।
      विश्राम के समय मास्‍टर का मिज़ाज सहज और मुक्‍त होता था। उनके भाव हमेशा प्रसन्‍न और सजग होते थे।
ओशो का नज़रिया:
      मुझे कन्‍फ्यूशियस बिलकुल पसंद नहीं है, और उसमें मुझे कोई अपराध भाव महसूस नहीं होता। मुझे बड़ा हल्‍का लग रहा है यह सोचकर अब यह किताब में दर्ज हो रहा है। कन्‍फ्यूशियस और लाओत्से समसामयिक थे। लाओत्से उम्र में थोड़ा बड़ा था। कन्फ्यूशियस लाओत्से से मिलने भी गया था। लेकिन कंपते हुए वापस आया। जड़ें हिल गई थीं, पसीना-पसीना हो गया था।
      उसके शिष्‍यों ने पूछा, ‘’क्‍या हुआ गुफा में? आप दोनों ही थे भीतर, और कोई नहीं था।‘’
      ‘’वह वास्‍तव में खतरनाक है।‘’
      कन्‍फ्यूशियस सच कह रहा था। लाओत्से जैसा आदमी तुम्‍हें मार सकता है। ताकि पुनरुज्जीवित कर सके। और जब तम तुम करने को तैयार नहीं होते तब तक तुम्‍हारा पुनर्जन्‍म नहीं हो सकता है। कन्‍फ्यूशियस अपने ही पूनर्जन्‍म से भाग खड़ा हुआ। मैंने लाओत्से को चुन लिया है। सदा के लिए। कन्‍फ्यूशियस बहुत साधारण, बहुत भौतिक जगत का हिस्‍सा है। ये बात दर्ज हो कि मैं उसे पसंद नहीं करता। वह पाखंडी है। आश्चर्य है कि वह इंग्‍लैंड में पैदा नहीं हुआ। लेकिन उन दिनों चीन इंग्‍लैंड जैसा ही था। उन दिनों इंग्‍लैंड जंगली था, वहशी था, वहां कुछ भी मूल्यवान नहीं था।
      कन्‍फ्यूशियस राजनैतिक था, धूर्त और चालाक था। लेकिन बहुत बुद्धिमान नहीं था। अन्‍यथा वह लाओत्से के चरणों में गिर जाता। भागता नहीं। वह सिर्फ लाओत्से से ही डरा नहीं था, वह मौत से भी डर गया था। क्‍योंकि लाओत्से और मौत एक ही है। लेकिन मैं कन्‍फ्यूशियस की कोई प्रसिद्ध किताब सम्‍मिलित करना चाहता था—सिर्फ उसे न्‍याय देने के लिए ‘’एनेलेक्टस’’ उसकी सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण किताब है। मेरे लिए वह एक वृक्ष की जड़ों की भांति है। कुरूप लेकिन आवश्‍यक—जिसे तुम आवश्‍यक अशुभ कहते हो। एनेलेक्टस एक आवश्‍यक अशुभ है। उसमे वह संसार और सांसरिक विषयों के संबंध में, राजनीति और तमाम चीजों के संबंध में बात करता है।
      एक शिष्‍य ने पूछा, ‘’मास्‍टर मौन के बारे में क्‍या? वह चिढ़ गया, चिल्‍लाया। चीख कर उसने कहा, खामोश, मौन.... ? मौन का अनुभव तुम कब्र में करोगे। जीवन में उसकी कोई जरूरत नहीं है। बहुत सी महत्‍वपूर्ण चीजें है करने के लिए।‘’
      तुम समझ सकते हो मैं उसे पसंद क्‍यों नहीं करता। उस पर दया आती है। भला आदमी था लेकिन दुर्भाग्‍य श्रेष्‍ठतम व्‍यक्‍ति के, लाओत्से के करीब आकर चूक गया। मैं उसके लिए आंसू गिरा सकता हूं
ओशो
बुक्‍स आय हैव लव्‍ड

( लाओत्से से जब कन्फ्यूशियस मिला और, पहला सवाल यह किया कि धर्म क्‍या है। तब लाओत्से ने उसे कहा था। जिसे तू धर्म कहता है, वह धर्म के जूते तो है ही नहीं, उन जूतों के निशान भी नहीं है। तब कफ्यूशियस इतना डर गया कि उसे बहार आकर अपने शिष्‍यों से कहा इस आदमी की परछाई से भी दूर रहना इसके पास कभी मत जाना।)
स्‍वामी आनंद प्रसाद

दि बुक ऑफ ली तज़ु—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

कन्‍फ्यूशियन दर्शन के बाद, ताओ वाद की बहुत बड़ी दार्शनिक परंपरा है। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में ताओ दर्शन प्रौढ़ हुआ। और तभी से ताओ ग्रंथों में किसी ली तज़ु नाम के रहस्‍यदर्शी का उल्‍लेख पाया जाता है। जी तज़ु जो हवाओं पर सवार होकर यात्रा करता था। उसकी ऐतिहासिकता भी संदिग्‍ध है। पता नहीं उसका समय क्‍या था। कुछ सुत्रों के अनुसार वह ईसा पूर्व 600 में हुआ, और कुछ कहते है 400 में पैदा हुआ। ली तज़ु एक व्‍यक्‍ति भी है, और दर्शन भी। कहते है ली तज़ु पु-तिएन शहर में रहता था। और चालीस साल तक किसी ने उसकी दखल नहीं ली। और राज्‍य के उच्‍च पदस्‍थ और राजसी परिवार के लोग उसे सामान्‍य आदमी समझते थे। चेंग में सूखा पडा और ली तज़ु ने वेइ जाने का फैसला लिया।

      उसके नाम से जो किताब प्रचलित है वह कहानियों, निबंधों और कहावतों का संकलन है। किताब के आठ परिच्‍छेद है। उनमें से ‘’याँग चु’’ शीर्षक से जो परिच्‍छेद है वह सुखवाद का समर्थन करता है। बाकी सात परिच्‍छेदों का संकलन ताओ तेह किंग और च्‍वांग तज़ु के बाद सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण किताब बन गई है। चीनी विद्वानों के मुताबिक यह किताब 300 ईसवी में संकलित की गई थी। यह ताओ वाद का दूसरा सृजनात्‍मक काल था।
      ताओ अर्थात मार्ग, या कहें वह नियम जिससे आस्‍तित्‍व की हर चीज संचालित होती है। आकाश, पृथ्‍वी और उनके बीच की असंख्‍य वस्‍तुएं जो एक नियम से जीती है—रात और दिन, ऋतुऐ विकास और विनाश जन्‍म मृत्‍यु। सिर्फ मनुष्‍य को ही उसके नियम की जानकारी नहीं है। प्राचीन समय के ऋषि जीने का सही ढंग जानते थे और राज करते थे।
      ताओ वाद बनने के लिए दार्शनिक होने की आवश्‍यकता नहीं है। उसे बौद्धिक तर्क-वितर्क में पड़ने की जरूरत नहीं है। वह लोगों को सूत्रों, कहानियों और कविताओं के द्वारा मार्ग दर्शन करता है। ली तज़ु की ताकत उसकी जीवंत अद्भुत हास्‍यपूर्ण कहानियों में है। पश्‍चिम के बुद्धिवाद मस्‍तिष्‍क के लिए ताओ कुछ ज्‍यादा ही साधारण और बेबूझ लगता है। ताओ वाद इसी विश्‍व में रहते है लेकिन उन्‍हें वह इतना निराशा जनक नहीं लगता जितना पाश्‍चात्‍य लोगों का लगता है।
      ली तज़ु के इस परिच्‍छेद में ताओ वाद का दृष्‍टिकोण झलकता है। तुम्‍हारा अपना शरीर तुम्‍हारी मलकियत नहीं है। यह एक आकार है जो तुम्‍हें धरती और आकाश ने दिया है। तुम्‍हारे जीवन पर तुम्‍हारा कोई अधिकार नहीं है, वह तुम्‍हारी ऊजाओं के बीच हुआ मेल है जो धरती और आकाश ने कुछ समय के लिए दिया है। तुम्‍हारा स्‍वभाव और तुम्‍हारी तकदीर तुम्‍हारी अपनी नहीं है, वह एक मार्ग है धरती और आकाश द्वारा बनाया हुआ। तुम्‍हारे बच्‍चे और पोते तुम्‍हारे नहीं है। धरती और आकाश ने तुम्‍हारे शरीर से पैदा किया है। जैसे कीड़े अपनी चमड़ी को छोड़ देते है। तुम धरती और आकाश की श्‍वास हो जो बाहर भीतर जाती है। तुम उस पर मलकियत कैसे कर सकते हो।
      चीनी दर्शन में ची या प्राण आस्‍तित्‍व का बुनियादी तत्‍व है जिससे विश्‍व बना है। शुन्‍य में से ची प्रगट हुआ। अपने स्‍त्रोत पर वि विशुद्ध और हल्‍का था। लेकिन सधन होते-होते उसके दो हिस्‍से बने। जो हल्‍का था वह आकाश बना और जो भारी था वह पृथ्‍वी बना।
      ली तज़ु या चीनी दर्शन बहुत विधायक है, उसे सर्व स्‍वीकार है। उसके बुनियादी तत्‍व है:
      1—जो विपरीत है वे एक दूसरे के परि पूर्वक है। और एक के बिना दूसरा संभव नहीं है।
      2—व्‍यक्‍ति का होना भ्रांति है। व्‍यक्‍ति का जन्‍म और मृत्‍यु ची के अंतहीन रूपांतरण में घटने वाली घटनाएं है।
      3—शून्‍यता, जिससे हम आये है, हमारा असली घर है। उससे हम ज्‍यादा देर भाग नहीं सकते है।
      4—मृत्‍यु कैसी होती है इसकी हम कल्‍पना भी नहीं कर सकते इसलिए डरने का कोई सवाल ही नहीं है। शायद मृत्‍यु का हम जीवन से अधिक मजा ले सकते है।
      ली तज़ु का आदर्श सब कुछ त्यागना नहीं है। वरन बहुत पैनी संवेदनशीलता को जगाना और प्रतिसंवेदन करने की क्षमता है। ‘’मेरे शरीर का मेरे मन के साथ तालमेल है, मेरे मन का ऊर्जाओं के साथ मेरी ऊर्जा का आत्मा के साथ और आत्‍मा का शून्‍य के साथ तालमेल है।
      ‘’जब सूक्ष्‍म से सूक्ष्‍म चीज या हल्‍की सी ध्‍वनि मुझे प्रभावित करती है तो चाहे वह सुदूर आठ सीमाओं के पार हो या मरी भौहों और पलकों के बीच हो। मैं उसे जान जाता हूं। हालांकि मुझे यह पता नहीं है कि मैं उसे सिर के साथ छेदों द्वारा जानता हूं। या मेरे चार अंगों द्वारा या मेरे ह्रदय या पेट के द्वारा। वह केवल आत्‍मज्ञान है।
      ‘’जब मेरे भीतर और बाहर सब समाप्‍त हो गया, मेरी आंखें मेरे कानों जैसी हो गई। मेरे कान नाक जैसे, मेरी नाक मुंह जैसी हो गई। तब सब एक हो गया।
      ‘’ मेरा मन एकाग्र हुआ और शरीर शिथिल अस्‍थियां और मांस धुल मिल गया। मुझे ख्‍याल नहीं आया कि मेरा शरीर किस पर टिका है और पैर कहां जा रहे है। मैं हवा की मानिंद पूरब पश्‍चिम बहता रहा। मानो सूखा हुआ पत्‍ता या घास हो। और मैं कभी जान नहीं सका कि हवा मुझे पर सवार है या हवा पर।‘’
      अगर तुम्‍हारे भीतर कुछ भी सख्‍त नहीं हो
      तो बहार की चीजें स्‍वयं ही प्रगट कर देंगी
      गति करो तो पानी जैसे बहो
      प्रतिध्‍वनि जैसे प्रतिसंवेदित होओ
      ली तज़ु और पूरा चीनी दर्शन मृत्‍यु के अहसास से भरा है। उसकी बहुत सी कहानियां मृत्‍यु के संबंध में है।
      ताओ दर्शन में एक तरह की निर्दोषिता है जो बच्‍चों की सी सरलता से अद्भत लोक, रोमांच और किवदंतियों में विश्‍वास करती है। जैसे, उनकी कहानियों में सम्राट मरते समय आकाश में उड़ जाता है। यह हकीकत तो नहीं हो सकती। लेकिन यह आस्‍था कि दृश्‍य जगत के पार कुछ है जो अज्ञात है, ताओ वाद की संवेदना का महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा है। प्राचीन चीन में अल्‍केमिस्‍टों का एक संप्रदाय शारीरिक अमरता में विश्‍वास रखता था और उस दिशा में रसायनों की खोज करता था। लेकिन वे ताओ वाद की मुख्‍य धारा का हिस्‍सा कभी नहीं बने।
      ली तज़ु का दर्शन भी कहानियों से बना हुआ है। ये छोटी-छोटी कहानियां वह सब कह देती है जो बड़े-बड़े दर्शन शास्‍त्र नहीं कह पाते।
     
ली तज़ु की कहानियां
      ली तज़ु      ची जा रहा था लेकिन आधे रास्‍ते से वापस लौट आया। रास्‍ते में उसे पो हुन वू जेन मिला। उसने पूछा कि वह बीच में ही क्‍यों लौट आया?
      ‘’मैं किसी बात से चौंक गया, सावधान हुआ।‘’
      ‘’किस बात से?’’
      ‘’मैंने देस होटलों में खाना खाया और पाँच होटलों में उन्‍होंने मुझे पहले परोसा।‘’
      ‘’ अगर इतनी सी बात है तो तुम चौंक क्‍यों गये?’’
      ‘’जब व्‍यक्‍ति की आंतरिक एकात्मता दृढ़ नहीं होती तो उसके शरीर से कुछ रिसता है और उसके आभा मंडल में प्रविष्‍ट होता है। और वह बाहरी तल पर लोगों को उसे सम्‍मान देने के लिए विवश करता है। उससे वरिष्ठ और श्रेष्‍ठ लोगों की बजाएं। और उससे वह मुश्‍किल में पड़ जाता है।
      होटल वाले का एकमात्र मकसद उसके चावल और दाल बेचकर पैसा कमाना होता है। उसका लाभ बहुत थोड़ा है। अगर ऐसे लोग जिनको मेरे से इतना थोड़ा लाभ होना है, एक ग्राहक के नाते मेरी इतनी इज्‍जत करते है तो दस हजार रथों का मालिक, जिसके राजकाज में अपना शरीर जर्जर कर लिया है और अपना ज्ञान खाली कर लिया है। उसके साथ यह घटना और भी बदतर नहीं होगी? ची का राजकुमार मुझे किसी पर नियुक्‍त करेगा और आग्रह करेगा कि मैं कुशलता से काम करूं। इससे मैं सावधान हो गया।‘’
      बहुत बढ़िया नजरिया है। लेकिन तुम यहां रह गए तो बाकी लोग तुम पर जिम्‍मेदारी डालेंगे।‘’
      थोड़े ही समय बाद, जब पो-हुन बू-जेन ली तज़ु से मिलने गया तो ली तज़ु का बरामदा अतिथियों के जूतों से भरा हुआ था। पो-हुन-बू जेन उत्‍तर की और अभिमुख होकर खड़ा हुआ। (ली तज़ु गुरु के आसन पर दक्षिण की और अभिमुख था।) वहां कुछ देर खड़े रहने के बाद कुछ कहे बगैर वह चल दिया। द्वारपाल ने ली तज़ु को खबर की। ली तज़ु जूते हाथ में लेकर नंगे पाँव दौड़ पडा और द्वार के पास उसे पकड़ा।
      ‘’अब चुंकी आप आ गये। है महाराज क्‍या मुझे मेरी औषधि नहीं देंगे?’’
      ‘’पो-हुन-वू-जेन बोला, ‘’बहुत हो गया। मैंने तुझे विश्‍वास पूर्वक कहा था कि लोग तेरे ऊपर जिम्‍मेदारी डालेंगे। और उन्‍होंने डाल दी। ऐसा नहीं है कि तुम उन्‍हें रोकने में सक्षम नहीं हो। लोगों पर ऐसा प्रभाव पड़ने से तुम्‍हें क्‍या मिलता है। जो तुम्‍हारी अपनी शांति को भंग करता है? अगर तुम दूसरों को प्रभावित करना ही चाहते हो तो वह तुम्‍हारे बुनियादी केंद्र को विचलित कर देगा।‘’
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      त्‍झु कुंम पढ़ाई कर-करके थक गया। उसने कन्‍फ्यूशियस से कहा, ‘’मुझे विश्राम खोजना है।‘’
      ‘’जिंदा लोगों के लिए विश्राम नहीं है।‘’
      ‘’तो क्‍या मैं उसे कभी नहीं पा सकूंगा।‘’
      ‘’पाओगे। तुम्‍हारी कब्र के विशाल, गुंबद समान टीले की प्रतीक्षा करो, और जान लो कि तुम्‍हें विश्राम कहां मिलेगा।‘’
      ‘’मौत महान है। भद्र जनों को उसमे विश्राम मिलता है और क्षुद्र आदमी उसमे पनाह ढूँढता है।‘’
      त्झु कुंम, तुम समझ गये। सभी लोग जीवन की खुशी को समझते है। उसके दुःख को नहीं। बुढ़ापे की थकान को जानते है। उसकी सहजता को नहीं। मृत्‍यु की कुरूपता को जानते है। उसके विश्राम को नहीं।‘’
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      ली तज़ु हु तज़ु के साथ पढ़ाई कर रहा था। हु तज़ु ने उससे कहा, ‘’जब तुम पीछे रहना जानोंगे तब मैं तुम्‍हें सिखाना शुरू करूंगा कि कैसा आचरण हो।‘’
      ‘’कृपया कर मुझे पीछे रहना सिखाये।‘’
      ‘’तुम्‍हारी छाया को देखो और तुम समझ जाओगे।‘’
      ली तज़ु ने पीछे मुड़कर अपनी छाया का निरीक्षण किया। जब उसका शरीर झुका तब उसकी छाया तिरछी था। जब उसका शरीर सीधा था, तब छाया सीधी थी। तो झुकना या सीधे खड़े रहना शरीर पर निर्भर करता है न कि छाया पर। और हम सक्रिय हों या निष्‍क्रिय यह दूसरों पर निर्भर करता है, न कि स्‍वयं पर।
      ‘’पीछे रहकर आगे रहने का यहीं मतलब है।‘’
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      कुआन मिन न ली तज़ु से कहां, ‘’यदि तुम्‍हारे शब्‍द सुंदर या असुंदर है तो वैसी ही उसकी प्रतिध्वनि होगी। यदि तुम्‍हारी आकृति छोटी या लंबी हो तो वैसी ही उसी छाया होगी। शोहरत प्रतिध्‍वनि है। आचरण छाया है। इसलिए कहते है:
      अपने शब्‍दों के प्रति सावधान रहना।
      क्‍योंकि कोई न कोई उनसे सहमत होगा।
      अपने आचरण की फ्रिक करना
      कोई न कोई उसकी नकल करेगा।
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      कन्‍फूशियस लू-लियांग जलप्रपात को देख रहा था। पानी सौ फीट छलांग लगा रहा था। और तीस मील तक उसका फेन उछल रहा था। वह ऐसी जगह थी जहां मछलियाँ, कछुए और मगरमच्‍छ नहीं तैर सकते थे। लेकिन वहां उसने एक आदमी को तैरते हुए देखा। यह सोचकर कि कोई किस्‍मत का मारा अपनी जान देने पर उतारू है। उसने एक शिष्‍य को उस आदमी को बचाने के लिए भेजा। लेकि कुछ दूरी तक तैरने के बाद वह आदमी बाहर आया। और गुनगुनाता हुआ किनारे पर चलने लगा।
      कन्‍फूशियस ने उससे पूछा, ‘’मैंने सोचा तुम कोई भूत-प्रेत हो लेकिन तुम तो आदमी दिखाई देते हो। क्‍या मैं पूछ सकता हूं कि पानी से गुजरने का कोई तिलिस्‍म तुम्‍हें आता है।‘’
      ‘’नहीं कोई तिलस्‍म नहीं आता। मेरे लिए तो जन्‍म जाता है, उससे मैंने शुरू आत की है। जो नैसर्गिक है उसमे मैं पला और नियति पर श्रद्धा कर मैं प्रौढ़ हुआ। मैं भीतर आनेवाले के प्रवाह के साथ भँवर में उतरता हूं और बहार जानेवाले प्रवाह के साथ बाहर निकलता हूं। पानी पर अपने स्‍वभाव को थोपने की बजाये मैं पानी के स्‍वभाव के पीछे चलता हूं। इस प्रकार मैं पानी से संबंधित होता है।‘’
      ‘’क्‍या मतलब है तुम्‍हारा? थोड़ा स्‍पष्‍ट करोगे?’’
      ‘’मैं जमीन पर पैदा हुआ, इस लिए जमीन पर सुरक्षित हूं—यह जन्‍मजात है। मैं पानी पर पला इसलिए पानी में सुरक्षित हूं—ये नैसर्गिक है। और मैं बिना यह जाने उसे कहता हूं कि मैं यह कैसे करता हूं—यह नियति में श्रद्धा करना हुआ।‘’
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      ली तज़ु जरूरतमंद था। उसके चेहरे पर खाली पेट होने के निशान थे। एक अतिथि ने चेंग के मुख्‍य मंत्रि झु याँग से यह बात कही, ‘’ली तज़ु मार्ग को जानेवाला, ज्ञानी व्‍यक्‍ति है। अगर आपके राज्‍य में रहते हुए वह भूखा रहता है तो यह सोचा जायेगा कि आप उदार शास्‍ता नहीं है।‘’
      झु याँग ने फौरन आदेश देकर उसे भेंट स्‍वरूप आनाज भिजवाया। ली तज़ु उसके संदेश वाहक से मिलने बाहर आया। दो बार झुक कर धन्‍यवाद दिया और भेंट अस्‍वीकार कर दी।
      जब संदेशवाहक चला गया और ली तज़ु घर में आया तो उसकी पत्‍नी आंखे तरेरकर उसे देखने लगी और कहा, मैंने सुना है कि मार्ग को जाननेवाले ज्ञानियों के पत्‍नी और बच्‍चे आराम से रहते है। लेकिन अब, जबकि भुखमरी हमारे चेहरों पर लिखी हुई है, और मंत्रि आपको भोजन भेज रहा है, आप उसे लेने से इंकार कर रहे है। लगता है हमारे भाग्‍य में दुःख ही लिख हुआ है।‘’
      ली तज़ु ने मुस्‍कराते हुए कहा, ‘’ऐसा नहीं है कि मंत्रि मुझे निजी तौर पर जानता है, उसने किसी और के कहने पर मुझे अनाज भेजा है। मतलब, कभी वह मेरी निंदा भी करना चाहे तो वह दूसरे के कहने पर करेगा। इसलिए मैंने स्‍वीकार नहीं किया।‘’
ओशो का नजरिया:
      ली तज़ु पराकाष्‍ठा है ताओ त्‍ज़ु और च्‍वांग त्‍ज़ु की उसकी किताब अपरिसीम रूप से सुंदर है इसलिए मैं उसे अपनी सूची में सम्‍मिलित करता हूं।
ली तज़ु कौन था?
      पश्‍चिम के विद्वान ली तज़ु के बारे में परेशान रहे है—ऐसा कोई व्‍यक्‍ति हुआ भी या नहीं। यह काफी विवादास्‍पद है। उन्‍होंने इस पर कड़ी मेहनत की है कि ऐसा कोई व्‍यक्‍ति सचमुच में हुआ है। पूरब के लिए यह पूरी विद्वता मूर्खतापूर्ण है। यह कोई अर्थ नहीं रखता है कि ऐसा कोई व्‍यक्‍ति हुआ या नहीं। यदि तुम मुझसे पूछे कि वह हुआ या नहीं, मेरे लिए दोनों बराबर है। जिसने भी ये सुंदर कहानियां लिखी है, वह ली तज़ु है—कोई भी। एक बात तय है कि किसी ने ये सुंदर कहानियां लिखी है। इतना तो पक्‍का है। क्‍योंकि कहानियां है।
      अब, कहानियां ली तज़ु नाम के व्‍यक्‍ति ने लिखी है या किसी दूसरे नाम के व्यक्ति ने, उससे क्‍या फर्क पड़ता है? उससे कहानियों में कुछ जुड़ेगा नहीं, वे पूर्ण है। उससे कहानियां से कुछ कम नहीं होगा। ली तज़ु ऐतिहासिक व्‍यक्‍ति है या नहीं। यह इन कहानियों को कैसे प्रभावित कर सकता है? ये कहानियां इतनी सुंदर है, उनका अंतनिर्हित मूल्‍य है। एक बात तय है कि किसी ने उनको लिखा है—पर उसका नाम क्‍या था, इसे लेकिन परेशान क्‍यों हो, वह ली तज़ु था या कोई ओर?
      यह हो सकता है कि ये कई लोगों द्वारा लिखी गई हो, तब भी कोई समस्‍या नहीं है। जिसने भी ये कहानियां लिख है उसने ताओ की चेतना को जीया है। इसके बिना यह लिखी नहीं जा सकती। एक व्‍यक्‍ति ने लिखा हो या अनेक व्‍यक्‍तियों ने, परंतु जब भी ये कहानियां लिखी गई है कोई ताओ चेतना के गहरे में उतरा है, किसी ने जीवन का अर्थ जाना है। किसी के पास दर्शन है।
      ली तज़ु संदेहास्‍पद है। वह किसी भी तरह से ऐतिहासिक व्‍यक्‍ति नहीं है। उसने कोई पदचिह्न नहीं छोड़ा है। या तो वह कोई ऐतिहासिक व्‍यक्‍ति नहीं था। या कोई महान घोड़ा था। मेरे लिए ये गैर महत्‍वपूर्ण है। वह महान घोड़ा था जिसने कभी धूल नहीं उड़ाई और अपने पीछे कोई राह नहीं छोड़ी।
      उसने अपने आपको पूरी तरह से भुला दिया। मात्र यह छोटी-सी पुस्तक है—‘’दि बुक ऑफ ली तज़ु’’ इन छोटी सी कथाओं के साथ। यह ली तज़ु के बारे में कुछ नहीं कहती है।
      ली तज़ु हो सकता है। कि कोई स्‍त्री हो। वह हो सकता है कि आदमी हो। कौन जानता है? वह चीनी हो सकता है, वह तिब्‍बती हो सकता है। कौन जानता है? हो सकता है वह हुआ ही नहीं हो। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। परंतु इन कथाओं का मूल्‍य है। ये कथाएं द्वार है।
ओशो
ताओ, दी पाथलेस पाथ, भाग—2

दि बुक ऑफ ली तज़ु—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

कन्‍फ्यूशियन दर्शन के बाद, ताओ वाद की बहुत बड़ी दार्शनिक परंपरा है। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में ताओ दर्शन प्रौढ़ हुआ। और तभी से ताओ ग्रंथों में किसी ली तज़ु नाम के रहस्‍यदर्शी का उल्‍लेख पाया जाता है। जी तज़ु जो हवाओं पर सवार होकर यात्रा करता था। उसकी ऐतिहासिकता भी संदिग्‍ध है। पता नहीं उसका समय क्‍या था। कुछ सुत्रों के अनुसार वह ईसा पूर्व 600 में हुआ, और कुछ कहते है 400 में पैदा हुआ। ली तज़ु एक व्‍यक्‍ति भी है, और दर्शन भी। कहते है ली तज़ु पु-तिएन शहर में रहता था। और चालीस साल तक किसी ने उसकी दखल नहीं ली। और राज्‍य के उच्‍च पदस्‍थ और राजसी परिवार के लोग उसे सामान्‍य आदमी समझते थे। चेंग में सूखा पडा और ली तज़ु ने वेइ जाने का फैसला लिया।

      उसके नाम से जो किताब प्रचलित है वह कहानियों, निबंधों और कहावतों का संकलन है। किताब के आठ परिच्‍छेद है। उनमें से ‘’याँग चु’’ शीर्षक से जो परिच्‍छेद है वह सुखवाद का समर्थन करता है। बाकी सात परिच्‍छेदों का संकलन ताओ तेह किंग और च्‍वांग तज़ु के बाद सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण किताब बन गई है। चीनी विद्वानों के मुताबिक यह किताब 300 ईसवी में संकलित की गई थी। यह ताओ वाद का दूसरा सृजनात्‍मक काल था।
      ताओ अर्थात मार्ग, या कहें वह नियम जिससे आस्‍तित्‍व की हर चीज संचालित होती है। आकाश, पृथ्‍वी और उनके बीच की असंख्‍य वस्‍तुएं जो एक नियम से जीती है—रात और दिन, ऋतुऐ विकास और विनाश जन्‍म मृत्‍यु। सिर्फ मनुष्‍य को ही उसके नियम की जानकारी नहीं है। प्राचीन समय के ऋषि जीने का सही ढंग जानते थे और राज करते थे।
      ताओ वाद बनने के लिए दार्शनिक होने की आवश्‍यकता नहीं है। उसे बौद्धिक तर्क-वितर्क में पड़ने की जरूरत नहीं है। वह लोगों को सूत्रों, कहानियों और कविताओं के द्वारा मार्ग दर्शन करता है। ली तज़ु की ताकत उसकी जीवंत अद्भुत हास्‍यपूर्ण कहानियों में है। पश्‍चिम के बुद्धिवाद मस्‍तिष्‍क के लिए ताओ कुछ ज्‍यादा ही साधारण और बेबूझ लगता है। ताओ वाद इसी विश्‍व में रहते है लेकिन उन्‍हें वह इतना निराशा जनक नहीं लगता जितना पाश्‍चात्‍य लोगों का लगता है।
      ली तज़ु के इस परिच्‍छेद में ताओ वाद का दृष्‍टिकोण झलकता है। तुम्‍हारा अपना शरीर तुम्‍हारी मलकियत नहीं है। यह एक आकार है जो तुम्‍हें धरती और आकाश ने दिया है। तुम्‍हारे जीवन पर तुम्‍हारा कोई अधिकार नहीं है, वह तुम्‍हारी ऊजाओं के बीच हुआ मेल है जो धरती और आकाश ने कुछ समय के लिए दिया है। तुम्‍हारा स्‍वभाव और तुम्‍हारी तकदीर तुम्‍हारी अपनी नहीं है, वह एक मार्ग है धरती और आकाश द्वारा बनाया हुआ। तुम्‍हारे बच्‍चे और पोते तुम्‍हारे नहीं है। धरती और आकाश ने तुम्‍हारे शरीर से पैदा किया है। जैसे कीड़े अपनी चमड़ी को छोड़ देते है। तुम धरती और आकाश की श्‍वास हो जो बाहर भीतर जाती है। तुम उस पर मलकियत कैसे कर सकते हो।
      चीनी दर्शन में ची या प्राण आस्‍तित्‍व का बुनियादी तत्‍व है जिससे विश्‍व बना है। शुन्‍य में से ची प्रगट हुआ। अपने स्‍त्रोत पर वि विशुद्ध और हल्‍का था। लेकिन सधन होते-होते उसके दो हिस्‍से बने। जो हल्‍का था वह आकाश बना और जो भारी था वह पृथ्‍वी बना।
      ली तज़ु या चीनी दर्शन बहुत विधायक है, उसे सर्व स्‍वीकार है। उसके बुनियादी तत्‍व है:
      1—जो विपरीत है वे एक दूसरे के परि पूर्वक है। और एक के बिना दूसरा संभव नहीं है।
      2—व्‍यक्‍ति का होना भ्रांति है। व्‍यक्‍ति का जन्‍म और मृत्‍यु ची के अंतहीन रूपांतरण में घटने वाली घटनाएं है।
      3—शून्‍यता, जिससे हम आये है, हमारा असली घर है। उससे हम ज्‍यादा देर भाग नहीं सकते है।
      4—मृत्‍यु कैसी होती है इसकी हम कल्‍पना भी नहीं कर सकते इसलिए डरने का कोई सवाल ही नहीं है। शायद मृत्‍यु का हम जीवन से अधिक मजा ले सकते है।
      ली तज़ु का आदर्श सब कुछ त्यागना नहीं है। वरन बहुत पैनी संवेदनशीलता को जगाना और प्रतिसंवेदन करने की क्षमता है। ‘’मेरे शरीर का मेरे मन के साथ तालमेल है, मेरे मन का ऊर्जाओं के साथ मेरी ऊर्जा का आत्मा के साथ और आत्‍मा का शून्‍य के साथ तालमेल है।
      ‘’जब सूक्ष्‍म से सूक्ष्‍म चीज या हल्‍की सी ध्‍वनि मुझे प्रभावित करती है तो चाहे वह सुदूर आठ सीमाओं के पार हो या मरी भौहों और पलकों के बीच हो। मैं उसे जान जाता हूं। हालांकि मुझे यह पता नहीं है कि मैं उसे सिर के साथ छेदों द्वारा जानता हूं। या मेरे चार अंगों द्वारा या मेरे ह्रदय या पेट के द्वारा। वह केवल आत्‍मज्ञान है।
      ‘’जब मेरे भीतर और बाहर सब समाप्‍त हो गया, मेरी आंखें मेरे कानों जैसी हो गई। मेरे कान नाक जैसे, मेरी नाक मुंह जैसी हो गई। तब सब एक हो गया।
      ‘’ मेरा मन एकाग्र हुआ और शरीर शिथिल अस्‍थियां और मांस धुल मिल गया। मुझे ख्‍याल नहीं आया कि मेरा शरीर किस पर टिका है और पैर कहां जा रहे है। मैं हवा की मानिंद पूरब पश्‍चिम बहता रहा। मानो सूखा हुआ पत्‍ता या घास हो। और मैं कभी जान नहीं सका कि हवा मुझे पर सवार है या हवा पर।‘’
      अगर तुम्‍हारे भीतर कुछ भी सख्‍त नहीं हो
      तो बहार की चीजें स्‍वयं ही प्रगट कर देंगी
      गति करो तो पानी जैसे बहो
      प्रतिध्‍वनि जैसे प्रतिसंवेदित होओ
      ली तज़ु और पूरा चीनी दर्शन मृत्‍यु के अहसास से भरा है। उसकी बहुत सी कहानियां मृत्‍यु के संबंध में है।
      ताओ दर्शन में एक तरह की निर्दोषिता है जो बच्‍चों की सी सरलता से अद्भत लोक, रोमांच और किवदंतियों में विश्‍वास करती है। जैसे, उनकी कहानियों में सम्राट मरते समय आकाश में उड़ जाता है। यह हकीकत तो नहीं हो सकती। लेकिन यह आस्‍था कि दृश्‍य जगत के पार कुछ है जो अज्ञात है, ताओ वाद की संवेदना का महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा है। प्राचीन चीन में अल्‍केमिस्‍टों का एक संप्रदाय शारीरिक अमरता में विश्‍वास रखता था और उस दिशा में रसायनों की खोज करता था। लेकिन वे ताओ वाद की मुख्‍य धारा का हिस्‍सा कभी नहीं बने।
      ली तज़ु का दर्शन भी कहानियों से बना हुआ है। ये छोटी-छोटी कहानियां वह सब कह देती है जो बड़े-बड़े दर्शन शास्‍त्र नहीं कह पाते।
     
ली तज़ु की कहानियां
      ली तज़ु      ची जा रहा था लेकिन आधे रास्‍ते से वापस लौट आया। रास्‍ते में उसे पो हुन वू जेन मिला। उसने पूछा कि वह बीच में ही क्‍यों लौट आया?
      ‘’मैं किसी बात से चौंक गया, सावधान हुआ।‘’
      ‘’किस बात से?’’
      ‘’मैंने देस होटलों में खाना खाया और पाँच होटलों में उन्‍होंने मुझे पहले परोसा।‘’
      ‘’ अगर इतनी सी बात है तो तुम चौंक क्‍यों गये?’’
      ‘’जब व्‍यक्‍ति की आंतरिक एकात्मता दृढ़ नहीं होती तो उसके शरीर से कुछ रिसता है और उसके आभा मंडल में प्रविष्‍ट होता है। और वह बाहरी तल पर लोगों को उसे सम्‍मान देने के लिए विवश करता है। उससे वरिष्ठ और श्रेष्‍ठ लोगों की बजाएं। और उससे वह मुश्‍किल में पड़ जाता है।
      होटल वाले का एकमात्र मकसद उसके चावल और दाल बेचकर पैसा कमाना होता है। उसका लाभ बहुत थोड़ा है। अगर ऐसे लोग जिनको मेरे से इतना थोड़ा लाभ होना है, एक ग्राहक के नाते मेरी इतनी इज्‍जत करते है तो दस हजार रथों का मालिक, जिसके राजकाज में अपना शरीर जर्जर कर लिया है और अपना ज्ञान खाली कर लिया है। उसके साथ यह घटना और भी बदतर नहीं होगी? ची का राजकुमार मुझे किसी पर नियुक्‍त करेगा और आग्रह करेगा कि मैं कुशलता से काम करूं। इससे मैं सावधान हो गया।‘’
      बहुत बढ़िया नजरिया है। लेकिन तुम यहां रह गए तो बाकी लोग तुम पर जिम्‍मेदारी डालेंगे।‘’
      थोड़े ही समय बाद, जब पो-हुन बू-जेन ली तज़ु से मिलने गया तो ली तज़ु का बरामदा अतिथियों के जूतों से भरा हुआ था। पो-हुन-बू जेन उत्‍तर की और अभिमुख होकर खड़ा हुआ। (ली तज़ु गुरु के आसन पर दक्षिण की और अभिमुख था।) वहां कुछ देर खड़े रहने के बाद कुछ कहे बगैर वह चल दिया। द्वारपाल ने ली तज़ु को खबर की। ली तज़ु जूते हाथ में लेकर नंगे पाँव दौड़ पडा और द्वार के पास उसे पकड़ा।
      ‘’अब चुंकी आप आ गये। है महाराज क्‍या मुझे मेरी औषधि नहीं देंगे?’’
      ‘’पो-हुन-वू-जेन बोला, ‘’बहुत हो गया। मैंने तुझे विश्‍वास पूर्वक कहा था कि लोग तेरे ऊपर जिम्‍मेदारी डालेंगे। और उन्‍होंने डाल दी। ऐसा नहीं है कि तुम उन्‍हें रोकने में सक्षम नहीं हो। लोगों पर ऐसा प्रभाव पड़ने से तुम्‍हें क्‍या मिलता है। जो तुम्‍हारी अपनी शांति को भंग करता है? अगर तुम दूसरों को प्रभावित करना ही चाहते हो तो वह तुम्‍हारे बुनियादी केंद्र को विचलित कर देगा।‘’
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      त्‍झु कुंम पढ़ाई कर-करके थक गया। उसने कन्‍फ्यूशियस से कहा, ‘’मुझे विश्राम खोजना है।‘’
      ‘’जिंदा लोगों के लिए विश्राम नहीं है।‘’
      ‘’तो क्‍या मैं उसे कभी नहीं पा सकूंगा।‘’
      ‘’पाओगे। तुम्‍हारी कब्र के विशाल, गुंबद समान टीले की प्रतीक्षा करो, और जान लो कि तुम्‍हें विश्राम कहां मिलेगा।‘’
      ‘’मौत महान है। भद्र जनों को उसमे विश्राम मिलता है और क्षुद्र आदमी उसमे पनाह ढूँढता है।‘’
      त्झु कुंम, तुम समझ गये। सभी लोग जीवन की खुशी को समझते है। उसके दुःख को नहीं। बुढ़ापे की थकान को जानते है। उसकी सहजता को नहीं। मृत्‍यु की कुरूपता को जानते है। उसके विश्राम को नहीं।‘’
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      ली तज़ु हु तज़ु के साथ पढ़ाई कर रहा था। हु तज़ु ने उससे कहा, ‘’जब तुम पीछे रहना जानोंगे तब मैं तुम्‍हें सिखाना शुरू करूंगा कि कैसा आचरण हो।‘’
      ‘’कृपया कर मुझे पीछे रहना सिखाये।‘’
      ‘’तुम्‍हारी छाया को देखो और तुम समझ जाओगे।‘’
      ली तज़ु ने पीछे मुड़कर अपनी छाया का निरीक्षण किया। जब उसका शरीर झुका तब उसकी छाया तिरछी था। जब उसका शरीर सीधा था, तब छाया सीधी थी। तो झुकना या सीधे खड़े रहना शरीर पर निर्भर करता है न कि छाया पर। और हम सक्रिय हों या निष्‍क्रिय यह दूसरों पर निर्भर करता है, न कि स्‍वयं पर।
      ‘’पीछे रहकर आगे रहने का यहीं मतलब है।‘’
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      कुआन मिन न ली तज़ु से कहां, ‘’यदि तुम्‍हारे शब्‍द सुंदर या असुंदर है तो वैसी ही उसकी प्रतिध्वनि होगी। यदि तुम्‍हारी आकृति छोटी या लंबी हो तो वैसी ही उसी छाया होगी। शोहरत प्रतिध्‍वनि है। आचरण छाया है। इसलिए कहते है:
      अपने शब्‍दों के प्रति सावधान रहना।
      क्‍योंकि कोई न कोई उनसे सहमत होगा।
      अपने आचरण की फ्रिक करना
      कोई न कोई उसकी नकल करेगा।
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      कन्‍फूशियस लू-लियांग जलप्रपात को देख रहा था। पानी सौ फीट छलांग लगा रहा था। और तीस मील तक उसका फेन उछल रहा था। वह ऐसी जगह थी जहां मछलियाँ, कछुए और मगरमच्‍छ नहीं तैर सकते थे। लेकिन वहां उसने एक आदमी को तैरते हुए देखा। यह सोचकर कि कोई किस्‍मत का मारा अपनी जान देने पर उतारू है। उसने एक शिष्‍य को उस आदमी को बचाने के लिए भेजा। लेकि कुछ दूरी तक तैरने के बाद वह आदमी बाहर आया। और गुनगुनाता हुआ किनारे पर चलने लगा।
      कन्‍फूशियस ने उससे पूछा, ‘’मैंने सोचा तुम कोई भूत-प्रेत हो लेकिन तुम तो आदमी दिखाई देते हो। क्‍या मैं पूछ सकता हूं कि पानी से गुजरने का कोई तिलिस्‍म तुम्‍हें आता है।‘’
      ‘’नहीं कोई तिलस्‍म नहीं आता। मेरे लिए तो जन्‍म जाता है, उससे मैंने शुरू आत की है। जो नैसर्गिक है उसमे मैं पला और नियति पर श्रद्धा कर मैं प्रौढ़ हुआ। मैं भीतर आनेवाले के प्रवाह के साथ भँवर में उतरता हूं और बहार जानेवाले प्रवाह के साथ बाहर निकलता हूं। पानी पर अपने स्‍वभाव को थोपने की बजाये मैं पानी के स्‍वभाव के पीछे चलता हूं। इस प्रकार मैं पानी से संबंधित होता है।‘’
      ‘’क्‍या मतलब है तुम्‍हारा? थोड़ा स्‍पष्‍ट करोगे?’’
      ‘’मैं जमीन पर पैदा हुआ, इस लिए जमीन पर सुरक्षित हूं—यह जन्‍मजात है। मैं पानी पर पला इसलिए पानी में सुरक्षित हूं—ये नैसर्गिक है। और मैं बिना यह जाने उसे कहता हूं कि मैं यह कैसे करता हूं—यह नियति में श्रद्धा करना हुआ।‘’
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      ली तज़ु जरूरतमंद था। उसके चेहरे पर खाली पेट होने के निशान थे। एक अतिथि ने चेंग के मुख्‍य मंत्रि झु याँग से यह बात कही, ‘’ली तज़ु मार्ग को जानेवाला, ज्ञानी व्‍यक्‍ति है। अगर आपके राज्‍य में रहते हुए वह भूखा रहता है तो यह सोचा जायेगा कि आप उदार शास्‍ता नहीं है।‘’
      झु याँग ने फौरन आदेश देकर उसे भेंट स्‍वरूप आनाज भिजवाया। ली तज़ु उसके संदेश वाहक से मिलने बाहर आया। दो बार झुक कर धन्‍यवाद दिया और भेंट अस्‍वीकार कर दी।
      जब संदेशवाहक चला गया और ली तज़ु घर में आया तो उसकी पत्‍नी आंखे तरेरकर उसे देखने लगी और कहा, मैंने सुना है कि मार्ग को जाननेवाले ज्ञानियों के पत्‍नी और बच्‍चे आराम से रहते है। लेकिन अब, जबकि भुखमरी हमारे चेहरों पर लिखी हुई है, और मंत्रि आपको भोजन भेज रहा है, आप उसे लेने से इंकार कर रहे है। लगता है हमारे भाग्‍य में दुःख ही लिख हुआ है।‘’
      ली तज़ु ने मुस्‍कराते हुए कहा, ‘’ऐसा नहीं है कि मंत्रि मुझे निजी तौर पर जानता है, उसने किसी और के कहने पर मुझे अनाज भेजा है। मतलब, कभी वह मेरी निंदा भी करना चाहे तो वह दूसरे के कहने पर करेगा। इसलिए मैंने स्‍वीकार नहीं किया।‘’
ओशो का नजरिया:
      ली तज़ु पराकाष्‍ठा है ताओ त्‍ज़ु और च्‍वांग त्‍ज़ु की उसकी किताब अपरिसीम रूप से सुंदर है इसलिए मैं उसे अपनी सूची में सम्‍मिलित करता हूं।
ली तज़ु कौन था?
      पश्‍चिम के विद्वान ली तज़ु के बारे में परेशान रहे है—ऐसा कोई व्‍यक्‍ति हुआ भी या नहीं। यह काफी विवादास्‍पद है। उन्‍होंने इस पर कड़ी मेहनत की है कि ऐसा कोई व्‍यक्‍ति सचमुच में हुआ है। पूरब के लिए यह पूरी विद्वता मूर्खतापूर्ण है। यह कोई अर्थ नहीं रखता है कि ऐसा कोई व्‍यक्‍ति हुआ या नहीं। यदि तुम मुझसे पूछे कि वह हुआ या नहीं, मेरे लिए दोनों बराबर है। जिसने भी ये सुंदर कहानियां लिखी है, वह ली तज़ु है—कोई भी। एक बात तय है कि किसी ने ये सुंदर कहानियां लिखी है। इतना तो पक्‍का है। क्‍योंकि कहानियां है।
      अब, कहानियां ली तज़ु नाम के व्‍यक्‍ति ने लिखी है या किसी दूसरे नाम के व्यक्ति ने, उससे क्‍या फर्क पड़ता है? उससे कहानियों में कुछ जुड़ेगा नहीं, वे पूर्ण है। उससे कहानियां से कुछ कम नहीं होगा। ली तज़ु ऐतिहासिक व्‍यक्‍ति है या नहीं। यह इन कहानियों को कैसे प्रभावित कर सकता है? ये कहानियां इतनी सुंदर है, उनका अंतनिर्हित मूल्‍य है। एक बात तय है कि किसी ने उनको लिखा है—पर उसका नाम क्‍या था, इसे लेकिन परेशान क्‍यों हो, वह ली तज़ु था या कोई ओर?
      यह हो सकता है कि ये कई लोगों द्वारा लिखी गई हो, तब भी कोई समस्‍या नहीं है। जिसने भी ये कहानियां लिख है उसने ताओ की चेतना को जीया है। इसके बिना यह लिखी नहीं जा सकती। एक व्‍यक्‍ति ने लिखा हो या अनेक व्‍यक्‍तियों ने, परंतु जब भी ये कहानियां लिखी गई है कोई ताओ चेतना के गहरे में उतरा है, किसी ने जीवन का अर्थ जाना है। किसी के पास दर्शन है।
      ली तज़ु संदेहास्‍पद है। वह किसी भी तरह से ऐतिहासिक व्‍यक्‍ति नहीं है। उसने कोई पदचिह्न नहीं छोड़ा है। या तो वह कोई ऐतिहासिक व्‍यक्‍ति नहीं था। या कोई महान घोड़ा था। मेरे लिए ये गैर महत्‍वपूर्ण है। वह महान घोड़ा था जिसने कभी धूल नहीं उड़ाई और अपने पीछे कोई राह नहीं छोड़ी।
      उसने अपने आपको पूरी तरह से भुला दिया। मात्र यह छोटी-सी पुस्तक है—‘’दि बुक ऑफ ली तज़ु’’ इन छोटी सी कथाओं के साथ। यह ली तज़ु के बारे में कुछ नहीं कहती है।
      ली तज़ु हो सकता है। कि कोई स्‍त्री हो। वह हो सकता है कि आदमी हो। कौन जानता है? वह चीनी हो सकता है, वह तिब्‍बती हो सकता है। कौन जानता है? हो सकता है वह हुआ ही नहीं हो। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। परंतु इन कथाओं का मूल्‍य है। ये कथाएं द्वार है।
ओशो
ताओ, दी पाथलेस पाथ, भाग—2

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